13 अप्रैल 1699 में बैसाखी के पर्व के दिन गुरु गोबिंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। आज के दिन ही गुरु गोबिंद सिंह ने सबसे पहले 5 प्यारों को अमृत पान करवाया था। साथ ही पांच प्यारों के हाथों से स्वयं भी अमृत पान किया था।
गुरु गोबिंद सिंह का बचपन का नाम गोविन्द राय था। उनका जन्म 1666 में पौष सुदी सप्तमी को पटना शहर में हुआ। उनके जन्म के समय गुरु तेग बहादुर असम में थे। बाद में पंजाब लौटने पर उन्होंने परिवार को पंजाब ही बुला लिया।
गुरु तेग बहादुर जिस समय शहीद हुए थे, उस समय गोबिंद सिंह पंद्रह वर्ष के थे। इस घटना ने उन्हें झकझोर दिया। वे इस बात को जानते थे कि लोगों को शासकों के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए सैन्य शक्ति से ज्यादा लोगों का अवसाद दूर करना और उनमें नैतिक बल भरना जरूरी है।
एक बार गुरु गोबिंद सिंह ने संगत बुलाई और संगत के बीच आकर म्यान से अपनी तलवार निकाली और सभी से सवाल किया कि आप सबमें कोई है जो इस समय मेरे लिए अपना सिर कलम करवाने की क्षमता रखता है। यह सुनते ही संगत में सन्नाटा छा गया लेकिन तभी पहला हाथ भाई दया सिंह जी का उठा। तब गुरु गोबिंद सिंह उन्हें तंबू के पीछे ले गए और थोड़ी देर बाद नंगी तलवार से ताजा खून की बूंदें के साथ वापस लौटें।
इससे बाद संगत से धर्म सिंह, हिम्मत सिंह, मोहकम सिंह और साहिब सिंह ने अपना सिर कटवाने के लिए गुरु जी के साथ तंबू के पीछे गए।थोड़ी देर के बाद इन्ही पांच लोगों के साथ गुरु जी भी ठीक उसी प्रकार की वेशभूषा में बाहर निकले। यह वही पांच नौजवान थे, जिन्होंने कुछ देर पहले ही गुरु गोबिंद सिंह के कहने पर अपने सिर की कुर्बानी दी थी। इसके बाद सिख धर्म के हर आयोजन की गतिविधियों की देख रेख इन्हीं पंच प्यारों के हाथों में सौंपी गई। सिख धर्म के हर पर्व में गुरु ग्रंथ साहिब की पालकी के आगे इन पंच प्यारों को जगह दी जाती है।