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भगवान शिव के पंचमुख स्वरूप का गूढ़ रहस्य और आध्यात्मिक महत्व

Sun, 27 Jul 2025 11:36 AM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: श्वेता सिंह Updated Sun, 27 Jul 2025 11:36 AM IST
सार

Panchavaktra Shiva: अपने पांच मुख रूपी विशिष्ट मूर्तियों का रहस्य माता अन्नपूर्णा को बताते हुए भगवान शिव कहते हैं- “ब्रह्मा मेरे अनुपम भक्त हैं। उनकी भक्ति के कारण मैं प्रत्येक कल्प में दर्शन देकर उनकी समस्या का समाधान करता हूं।”

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The Divine Secret of Shiva’s Panchamukha Revealed to Goddess Annapurna
भगवान शिव पंचमुख स्वरूप, - फोटो : adobe stock

डॉ. अश्विनी पाण्डेय


असिस्टेंट प्रोफेसर, ज्योतिष विभाग
केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, लखनऊ


Significance Of Panchamukha Shiva: जगत के कल्याण की कामना से भगवान सदाशिव के विभिन्न कल्पों में अनेक अवतार हुए। इनमें उनके सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोर और ईशान अवतार प्रमुख हैं और यही भगवान शिव की पांच विशिष्ट मूर्तियां हैं। भगवान शिव का विष्णु जी से अनन्य प्रेम है। शिव तामस मूर्ति हैं और विष्णु सत्व मूर्ति, मगर एक-दूसरे का ध्यान करने से शिव श्वेत वर्ण के और विष्णु श्याम वर्ण के हो गए।
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ऐसा माना जाता है कि एक बार भगवान विष्णु ने अत्यंत मनोहर किशोर का रूप धारण किया। भगवान विष्णु द्वारा धारण किए इस मनोहर रूप को देखने के लिए चतुरानन ब्रह्मा, बहुमुख वाले अनंत, सहस्राक्ष इंद्र आदि देवता आए और प्रसन्न हुए। सभी देवताओं ने एकमुख वालों की अपेक्षा भगवान के रूप-माधुर्य का अधिक आनंद लिया। सभी को उस रूप का आंनद लेते देख भगवान शिव सोचने लगे कि यदि मेरे भी अनेक मुख और नेत्र होते तो मैं भी भगवान के इस किशोर रूप का सबसे अधिक दर्शन करता। भगवान शिव के मन में इस इच्छा के उत्पन्न होते ही वे पंचमुख हो गए।
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The Divine Secret of Shiva’s Panchamukha Revealed to Goddess Annapurna
भगवान शिव पंचमुख स्वरूप - फोटो : adobe stock

‘पंचानन’ और ‘पंचवक्त्र’ शिव
इच्छा से उत्पन्न भगवान शिव के ये पांच मुख- सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोर तथा ईशान हुए और प्रत्येक मुख में तीन-तीन नेत्र बन गए। भगवान शिव तभी से ‘पंचानन’ या ‘पंचवक्त्र’ कहलाने लगे। भगवान शिव के ये पांच मुख चार दिशाओं और पांचवां मध्य में है। भगवान शिव का पहला मुख पश्चिम दिशा में है, जो है ‘सद्योजात’। यह बालक के समान स्वच्छ, शुद्ध एवं निर्विकार है। उत्तर दिशा का मुख ‘वामदेव’ है। वामदेव अर्थात विकारों का नाश करने वाला। दक्षिण मुख ‘अघोर’ है। अघोर का अर्थ है- निंदित कर्म करने वाला। निंदित कर्म करने वाला भी भगवान शिव की कृपा से निंदित कर्म को शुद्ध बना लेता है। भगवान शिव के पूर्व मुख का नाम ‘तत्पुरुष’ है। तत्पुरुष का अर्थ है- अपनी आत्मा में स्थित रहना। वहीं अंतिम ऊर्ध्व मुख का नाम ‘ईशान’ है। ईशान का अर्थ है- स्वामी। भगवान शंकर के पांच मुखों में ऊर्ध्व मुख ईशान दुग्ध जैसे रंग का, पूर्व मुख तत्पुरुष पीत वर्ण का, दक्षिण मुख अघोर नील वर्ण का, पश्चिम मुख सद्योजात श्वेत वर्ण का और उत्तर मुख वामदेव कृष्ण वर्ण का है।
 

The Divine Secret of Shiva’s Panchamukha Revealed to Goddess Annapurna
भगवान शिव पंचमुख स्वरूप - फोटो : adobe

पंचमुख के पंचकृत्य
शिव पुराण में भगवान शिव कहते हैं, “सृष्टि, पालन, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह, ये पांच कृत्य (कार्य) मेरे पांचों मुखों द्वारा धारित हैं।” इस बात से स्पष्ट होता है कि भगवान शिव की पांच विशिष्ट मूर्तियां (मुख) विभिन्न कल्पों में लिए गए उनके अवतार हैं। माना गया है कि जगत के कल्याण की कामना से भगवान सदाशिव के विभिन्न कल्पों में अनेक अवतार हुए, जिनमें से सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोर और ईशान अवतार प्रमुख हैं। ये ही भगवान शिव की पांच विशिष्ट मूर्तियां (मुख) हैं। अपने पांच मुख रूपी विशिष्ट मूर्तियों का रहस्य माता अन्नपूर्णा को बताते हुए भगवान शिव कहते हैं, “ब्रह्मा मेरे अनुपम भक्त हैं। उनकी भक्ति के कारण मैं प्रत्येक कल्प में दर्शन देकर उनकी समस्या का समाधान किया करता हूं।”
 

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The Divine Secret of Shiva’s Panchamukha Revealed to Goddess Annapurna
भगवान शिव पंचमुख स्वरूप - फोटो : freepik

पहला अवतार ‘सद्योजात’
श्वेतलोहित नामक उन्नीसवें कल्प में ब्रह्मा सृष्टि रचना के ज्ञान के लिए परब्रह्म का ध्यान कर रहे थे। तब भगवान शंकर ने उन्हें अपने पहले अवतार ‘सद्योजात’ रूप में दर्शन दिए। इसमें वे एक श्वेत और लोहित वर्ण वाले शिखाधारी कुमार के रूप में प्रगट हुए और ‘सद्योजात मंत्र’ देकर ब्रह्मा जी को सृष्टि रचना के योग्य बनाया।

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भगवान शिव पंचमुख स्वरूप - फोटो : freepik

दूसरा अवतार ‘वामदेव’
रक्त नामक बीसवें कल्प में रक्त वर्ण ब्रह्मा पुत्र की कामना से परमेश्वर का ध्यान कर रहे थे। उसी समय उनसे एक पुत्र प्रगट हुआ, जिसने लाल रंग के वस्त्र-आभूषण धारण किए थे। यह भगवान शंकर का दूसरा अवतार ‘वामदेव’ रूप था, जो ब्रह्मा जी के जीव-सुलभ अज्ञान को हटाने और सृष्टि रचना की शक्ति देने के लिए हुआ था।

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