जन्मभूमि अयोध्या में राम मंदिर के भूमि पूजन के मुहूर्त को लेकर सवाल उठ रहे हैं। अगले महीने की 5 तारीख को अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन कार्यक्रम का आयोजन तय किया गया है। इस आयोजन में देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी हिस्सा लेंगे। कई संत भूमि पूजन के समय को अशुभ बता रहे हैं। उनका मानना है भाद्रपद के महीने में किसी भी तरह का शुभ कार्य का शुभारंभ अच्छा नहीं माना जाता है।
Ram Mandir Bhoomi Pujan Updates: सवाल-जवाब से जानें भूमि पूजन के मुहूर्त में उठ रहे विवाद को
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दरअसल, शासन को चतुर्मास में ही भूमि पूजन कराना था। इसलिए इस दौरान हरिशयन दोष आदि का विचार नहीं किया गया है। जबकि कई संत महात्माओं को इस पर आपत्ति है। भूमि पूजन के लिए 5 अगस्त का जो मुहूर्त दिया गया है उसको लेकर कई लोगों के जेहन में भी कई प्रकार के सवाल चल रहे हैं। इस संबंध में श्री गीर्वाणवाग्वर्धिनी सभा ने कुछ सवालों का जवाब दिया है। आइए जानते हैं राम मंदिर के भूमि पूजन के मुहूर्त को लेकर उठ रहे सवाल और उनके जवाब।
सवाल: तुला लग्न चर लग्न है। उसमें मंदिर निर्माण का मुहूर्त कैसे दिया गया, जबकि इसके लिए स्थिर लग्न या द्विस्वभाव के लग्न में मुहूर्त देना चाहिए था?
जवाब: लग्नशुद्धि देखकर मुहूर्त देना अत्यन्त कठिन होता है। क्योंकि उसमें कई चीजों का विचार करना पड़ता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, ऐसी स्थिति में जब स्थिर लग्न में मुहूर्त नहीं मिलता है तो संकटकाल में चर लग्न की परिस्थिति में नवांश स्थिर लेते हैं। अतः 5 अगस्त को मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन का मुहूर्त तुला लग्न में वृषनवांश में मुहूर्त आवश्यक होने से दिया गया है।
जवाब: 5 अगस्त 2020 को अयोध्या में अभिजीत मुहूर्त दिन में 12 बजकर 34 मिनट के पहले समाप्त हो जाता है। इस दिन तुला लग्न में वृषनवांश का प्रारंभ 12 बजकर 39 मिनट 20 सेकेंड के बाद ही होता है। अभिजीत मुहूर्त की समाप्ति उसके पूर्व ही हो जा रही है। जब वृषनवांश में मुहूर्त लिखकर दिया है तो अभिजीत मुहूर्त का सवाल ही नहीं आता है।
जवाब: वेद में शुक्ल पक्ष को पूर्व पक्ष (प्रथम पक्ष) तथा कृष्ण पक्ष को अपरपक्ष (द्वितीय पक्ष) कहा गया है। अमरकोषवचन का यह श्लोक भी इसी बात की पुष्टि करता है- 'पक्षौ पूर्वापरौ शुक्लकृष्णौ मासस्तु तावुभौ'। वहीं पंचांगों में अमावस्या तिथि के बोधनार्थ 30 संख्या देते हैं। जबकि पूर्णिमा तिथि के बोधनार्थ 15 संख्या देते हैं। अधिकमास एवं छयमास का प्रारंभ शुक्लपक्ष में प्रारंभ होता है तथा समाप्ति अमावस्या को होती है।