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इस तरह भारत में बढ़ा मनुस्मृति का महत्व

Sat, 12 Mar 2016 06:21 PM IST
एम राजीव लोचन/बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
एम राजीव लोचन/बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए Updated Sat, 12 Mar 2016 06:21 PM IST
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manusmriti in hindu society
मनुस्‍मृत‌ि

अंग्रेजों ने भी मनुस्मृत‌ि का प्रचार प्रसार क‌िया इसकी एक बड़ी वजह थी। लेक‌िन इसका महत्व बढ़ने का बस यही कारण नहीं था। पहला, भारत पर शासन करने वाली अंग्रेज़ कंपनी जिसने इस ग्रंथ को हिंदुओं का मूल ग्रंथ मान लिया। दूसरा, बनारस के पंडित, जिन्होंने अंग्रेज़ कंपनी को यह सीख दी कि 'मनुस्मृति' ही हिन्दू समाज का मूल ग्रंथ है जिसके आधार पर हिन्दू समाज चलता है। यह वाकया था 1770-1780 के दशक का। तीसरा, ज्योतिबा फुले और भीमराव अम्बेडकर।

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अंबेडकर

फुले ने अपने अनेक लेखों और कविताओं में 'मनुस्मृति' की कड़ी आलोचना की थी और अम्बेडकर ने गुस्से में इस ग्रंथ को जला कर देश और समाज से इसका असर ख़त्म करने के विचार पर अमल किया। अंदर की बात तो यह थी कि भारत के इतिहास में बनारस के ब्राह्मणों के अलावा ज़्यादातर लोग 'मनुस्मृति' के आधार पर न तो अपना जीवन बिताते थे, न इसे जरूरी मानते थे और ना ही कोई इसे पढ़ता था।

यह जरूर था कि अंग्रेजों ने अपनी कोर्ट कचहरी के दीवानी मुकदमों में कभी कभार 'मनुस्मृति' का सहारा लिया। हिन्दू समाज के बारे में अपनी राय बनाने में कभी-कभी 'मनुस्मृति' में कही गई बातों को आधार मान लिया गया। आख‌िरकार मूल रूप से 'मनुस्मृति' दीवानी मामलों पर लिखा गया ग्रंथ तो था ही। इसमें ऋण, दाय, वारिसी आदि पर कई नियम थे।

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मंद‌िर में पूजा

यह बात अलग है कि असल में हिन्दू समाज के लोग इन दीवानी मामलों को सुलझाने के लिए मनु का नहीं बल्कि यज्ञवल्क नीति वगैरह का इस्तेमाल करते थे। यह बात जरूर है की इस नीति में कई बार यह कहा गया कि वह मनु जी के ग्रंथ पर आधारित है। लेकिन उसमें प्रमुखता 'मनुस्मृति' के विचारों को न देकर, लोक परम्पराओं पर ज्यादा बल दिया गया था। फिर लोग 'मनुस्मृति' का इस्तेमाल क्यों नहीं करते थे, इसे कोई ख़ास महत्व क्यों नहीं देते थे? इसे समझने के लिए हमें 'मनुस्मृति' को समग्र रूप से पढ़ना होगा और उसे उसके सामाजिक सन्दर्भ में समझना पड़ेगा। कोई दो हज़ार साल पहले ब्राह्मणों ने 'मनुस्मृति' की रचना उस वक्त की जब देश से ब्राह्मणों और ब्राह्मणवादी विचारों का वर्चस्व खत्म हो रहा था।

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मनुस्‍मृत‌ि

ब्राह्मणों की परिपाटियों और रीति रिवाजों को भी लोगों ने किनारे रख छोड़ा था। बौद्ध संघ प्रमुख हो चुका था। ऐसे हालात में, ब्राह्मणों ने यह ग्रंथ बनाया और इसमें उन्होंने यह कहा कि ब्राह्मण ही समाज में सर्वश्रेष्ठ है। इनमें भी सर्वोपरि वह ब्राह्मण है जो गरीब है, जिसके हाथ में सत्ता नहीं है, जो बस अपने मन का मालिक है। यह भी कहा गया कि ब्राह्मण के साथ बुरा करने वाले का बड़ा बुरा होगा।समाज के अन्य वर्गों के लिए अनेकानेक नियम बनाए कि वे ब्राह्मण को किस तरह देवतुल्य मानें। यह लालच भी दिया गया कि यदि इस जन्म में सब बात मानोगे तो अगले जन्म में शायद तुम्हारे साथ कुछ अच्छा हो जाए। औरतों के बारे में भी कुछ बातें कही गईं। यह बताया गया कि वे किस तरह आदमियों से गौण हैं। पर, किसी को गौण बोलना एक बात है, उसका असल में गौण होना दूसरी बात है। सो आदमियों को चेताया गया कि घर की सारी इज्जत घरवाली के हाथ है।

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बनारस गंगा घाट

19वीं सदी में देश में एक और बदलाव आया। सत्ता की भाषा अंग्रेज़ी बन गई। चूँकि किताबी ज्ञान और अक्षर ज्ञान अब मूल रूप से ब्राह्मणों और ऊँची जातियों के हाथ में था, सो उन्होंने तेजी से अपने आप को इस नए माहौल में ढाल लिया। अंग्रेजी जानने वाले लोगों ने भारतीय सत्ता में पैठ बनाई। चूँकि ये लगभग सभी ब्राह्मण थे, सो अब इन लोगों को बाकी समाज पर अपना प्रभुत्व जमाने का मौका मिल गया। अपनी श्रेष्ठता को धार्मिक जामा देने के लिए वे यह भ्रामक विचार फैलाने लगे कि 'मनुस्मृति' ही हिन्दू समाज का मूल ग्रंथ है और उसमें दर्शाए गए ब्राह्मण के प्रभुत्व को सब लोगों को मान लेना चाहिए। जब 1870 के दशक में ज्योतिबा फुले दलितों, खेतिहरों और खेत मजदूरों के शोषण को देख कर बेचैन हुए, तो उन्होंने भटजी-सेठजी के प्रभुत्व पर हमला किया और इनके समर्थन में खड़े इस ग्रंथ, 'मनुस्मृति' के बारे में भी काफी बुरा भला कहा।

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