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कुशाग्रहणी अमावस्या कब पड़ेगी? जानें कुशा ग्रहण करने की सही तिथि, विधि और महत्व

Sun, 06 Sep 2026 10:43 PM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: श्वेता सिंह Updated Sun, 06 Sep 2026 10:43 PM IST
सार

कुशाग्रहणी अमावस्या 2026: हिंदू धर्म में कुशाग्रहणी अमावस्या का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन कुशा ग्रहण करने की परंपरा है। जानें 2026 में कुशाग्रहणी अमावस्या की सही तिथि, कुशा ग्रहण करने की विधि और इसका धार्मिक महत्व।
 

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Kushagrahani Amavasya 2026 Know the Exact Date, Rituals and Significance of Collecting Kusha Grass
kushagrahini amavasya 2026 - फोटो : amar ujala

हिंदू धर्म में पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान कई ऐसी चीजों का इस्तेमाल किया जाता है, जिन्हें विशेष रूप से पवित्र माना गया है। इन्हीं में से एक है कुशा घास। पूजा, हवन, यज्ञ, श्राद्ध कर्म और पितृ तर्पण जैसे धार्मिक कार्यों में कुशा का प्रयोग लंबे समय से किया जाता रहा है। धार्मिक मान्यताओं में इसे पवित्रता और सकारात्मक ऊर्जा से जोड़कर देखा जाता है। हर साल भाद्रपद मास में कुशा प्राप्त करने का एक विशेष अवसर आता है, जिसे कुशाग्रहणी अमावस्या के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान और मंत्रोच्चार के साथ कुशा ग्रहण करने से इसे पूरे वर्ष होने वाले धार्मिक कार्यों में इस्तेमाल किया जा सकता है।

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पितृ पक्ष - फोटो : adobe stock

कब है कुशाग्रहणी अमावस्या?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वर्ष 2026 में कुशाग्रहणी अमावस्या 10 सितंबर, गुरुवार को मनाई जाएगी। इस दिन पवित्र कुशा को विधिपूर्वक प्राप्त करने की परंपरा है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार कुशा ग्रहण करने के लिए भाद्रपद कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को विशेष माना गया है। इसी समय विधि के अनुसार कुशा प्राप्त करने की परंपरा बताई गई है।

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धार्मिक कार्यों में क्यों जरूरी मानी जाती है कुशा? - फोटो : adobe stock

धार्मिक कार्यों में क्यों जरूरी मानी जाती है कुशा?
सनातन परंपरा में कुशा को शुद्धता और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक अनुष्ठानों में इसका इस्तेमाल कई अलग-अलग रूपों में किया जाता है। पूजा-पाठ के दौरान कुशा से बने आसन का प्रयोग किया जाता है, वहीं संकल्प और पितृ कर्म में भी इसका विशेष महत्व बताया गया है। श्राद्ध और तर्पण जैसे कर्मों में कुशा का इस्तेमाल पितरों से जुड़े धार्मिक कार्यों का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। इसी तरह हवन और यज्ञ में भी कुशा का प्रयोग धार्मिक विधि के अनुसार किया जाता है। मान्यता है कि धार्मिक कार्यों में कुशा का इस्तेमाल करने से अनुष्ठान की पवित्रता बनी रहती है और व्यक्ति को कर्म का पूर्ण आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है।

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कुशाग्रहणी अमावस्या पर ही क्यों ग्रहण की जाती है कुशा? - फोटो : adobe stock

कुशाग्रहणी अमावस्या पर ही क्यों ग्रहण की जाती है कुशा?
शास्त्रीय मान्यताओं में कुशा को सालभर उपयोग में लाने के लिए एक विशेष समय पर प्राप्त करने की बात कही गई है। भाद्रपद कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को इसके लिए उपयुक्त माना जाता है। कुशाग्रहणी अमावस्या के दिन मंत्रोच्चार और धार्मिक विधि के साथ कुशा को ग्रहण कर सुरक्षित रखने की परंपरा है। इसके बाद इसका इस्तेमाल वर्षभर पूजा-पाठ, श्राद्ध, तर्पण, हवन और दूसरे धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है। यही वजह है कि इस दिन को कुशा प्राप्त करने के लिए विशेष माना जाता है।

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पूजा और श्राद्ध कर्म में कुशा का इस्तेमाल - फोटो : adobe stock

पूजा और श्राद्ध कर्म में कुशा का इस्तेमाल
कुशा का प्रयोग विशेष रूप से पितृ कर्म में किया जाता है। श्राद्ध या तर्पण के दौरान कुशा का इस्तेमाल धार्मिक प्रक्रिया का हिस्सा माना जाता है। इसके अलावा पूजा के समय कुशा के आसन पर बैठने की परंपरा भी कई धार्मिक अनुष्ठानों में देखने को मिलती है। हवन और यज्ञ में भी कुशा का उपयोग किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इससे अनुष्ठान की पवित्रता बनाए रखने में सहायता मिलती है।

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