हर साल भगवान कृष्ण का जन्मदिन जन्माष्टमी के तौर पर पूरे देश में मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि श्रीकृष्ण का जन्म अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। इसलिए प्रतिवर्ष भाद्र माह की अष्टमी को जन्माष्टमी मनाई जाती है। ऐसा कहा जाता है कि भगवान कृष्ण का जन्म पांच हजार साल पहले आधी रात को हुआ था। इसलिए आधी रात के बाद ही भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के बाद पूजा की जाती है। इस दिन व्रत अष्टमी तिथि से शुरू होती है और अगले दिन खत्म होती है।
Krishna Janamasthami 2019: पांच हजार साल पहले कृष्ण के जन्म पर हुई थी ये अनोखी घटना
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स्कंद पुराण के मुताबिक द्वापरयुग में मथुरा में महाराजा उग्रसेन राज करते थे। हालांकि उनके बेटे कंस ने अपने पिता को सिंहासन से हटा दिया और खुद राजा बन गया। कंस का अत्याचार हर रोज बढ़ता जा रहा था। कंस की एक बहन देवकी थी, जिसकी शादी वासुदेव से हुआ। कंस अपनी बहन से बहुत प्रेम करता था। वह खुद उसे ससुराल छोड़ने जाता था। एक दिन जब कंस अपनी बहन को ससुराल छोड़कर घर वापस जा रहा था। तभी बीच सड़क पर आकाशवाणी हुई कि हे कंस जिसे तू इतने प्रेम से विदा कर रहा है उसकी आंठवां पुत्र तेरा काल बनेगा। यह आकाशवाणी सुन कंस गुस्सा हो गया और उसने देवकी और वासुदेव को बंधक बना लिया।
कंस ने सोचा कि अगर वह देवकी के हर बेटे को मारता गया तो वह अपने काल को हराने में सफल होता गया। उसने यही शुरू किया। देवकी का जैसे ही कोई संतान होता वह उसे पटककर मार देता। सात पुत्रों को जन्म देने के बाद देवकी के 8वें पुत्र के जन्म की बारी आई। कंस इस बात को जानता था और इसलिए उसने सुरक्षा और कड़ी कर दी। हालांकि इस बार कंस की सारी योजनाएं धरी की धरी रह गईं। कृष्ण का जैसे ही जन्म हुआ कमरे में चारो तरफ रोशनी छा गई। उसी वक्त नंदगांव में यशोदा के पेट से एक बेटी का जन्म हुआ। कृष्ण का जन्म होते ही उनके पिता वासुदेव के हाथ-पैर में बंधी सारी बेड़ियां अपने आप खुल गईं। कारागार के सभी दरवाजे खुल गये और कारागार में मौजूद पहरेदारों को नींद आ गई। इसके बाद वासुदेव ने एक टोकरी में नवजात शिशु को रखा और नंद गांव की ओर चल पड़े।
वासुदेव जब यमुना किनारे पहुंचे तो नदी ने भी उन्हें रास्ता दे दिया। पूरे मथुरा में इस समय तेज बारिश हो रही थी ऐसे में शेषनाग स्वयं शिशु के लिए छतरी बनकर वासुदेव के पीछे-पीछे चलने लगे। वासुदेव यमुना पार कर नंदगांव पहुंचे और यशोदा के साथ कृष्ण को सुला दिया और स्वयं कन्या को लेकर मथुरा गये। यह कन्या दरअसल माया का एक रूप थी। वासुदेव जैसे ही कारागार पहुंचे, सबकुछ सामान्य और पहले की तरह हो गया। कंस को आठवें संतान के जन्म की खबर पहरेदारों से मिली तो वह उसे मारने वहां आ पहुंचा। कंस ने कन्या को अपने गोद में लिया और एक पत्थर पर पटकने की कोशिश की। हालांकि, इससे पहले ही वह कन्या आकाश में उड़ गई और माया का रूप ले लिया। साथ ही उसने कहा, 'अरे मूर्ख, मुझे मारने से क्या होगा? तुझे मारने वाला तो पहले ही कहीं और सुरक्षित पहुंच चुका है।'
यह सुनकर कंस बेहद क्रोधित हुआ और कृष्ण की खोज शुरू कर दी। कंस को जब कृष्ण के नंदगांव में होने की बात पता चली तो उसने कई बार उन्हें मारने का प्रयास किया लेकिन असफल रहा। आखिर में श्रीकृष्ण ने युवावस्था में कंस का वध किया राजा उग्रसेन समेत अपने माता-पिता को कारागार से बाहर निकाला।