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गणेश जी को तुलसी तो शिव जी को शंख से नहीं चढ़ाते जल, जानिए ऐसा क्यों?
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, दिल्ली
Updated Sun, 31 Dec 2017 07:54 PM IST
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Ganesha
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गणेश जी के पूजन में तुलसी का प्रयोग वर्जित है। पौराणिक कथानुसार एक बार गणेश जी गंगा किनारे तप कर रहे थे। इसी दौरान धर्मात्मज की नवयौवना तुलसी ने विवाह की इच्छा लेकर तीर्थ यात्रा पर प्रस्थान किया। भ्रमण करते हुए तुलसी गंगा के तट पर पंहुचीं। उन्होंने तरुण गणेश जी को तपस्या में लीन देखा और उनपर मोहित हो गईं। विवाह की इच्छा से तुलसी ने उनका ध्यान भंग कर दिया। तुलसी की मंशा जानकर गणेश जी ने तप भंग करने को अशुभ बताया और स्वयं को ब्रह्मचारी बताकर तुलसी के विवाह के प्रस्ताव को नकार दिया।
ganesha
- फोटो : amarujala
गणेश जी के इंकार से तुलसी बहुत दुखी हुईं और आवेश में आकर उन्होंने गणेश जी को दो विवाह का शाप दे दिया। उधर गणेश जी ने भी तुलसी को शाप दे दिया कि उसका विवाह एक असुर से होगा। एक राक्षस की पत्नी होने का शाप सुनकर तुलसी ने गणेश जी से माफी मांगी। तब श्री गणेश ने कहा कि तुम्हारा विवाह शंखचूड़ राक्षस से होगा। किंतु फिर तुम भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण को प्रिय होने के साथ ही कलयुग में जगत के लिए जीवन और मोक्ष देने वाली होगी। पर मेरी पूजा में तुलसी चढ़ाना शुभ नहीं माना जाएगा।
गणपति विसर्जन
- फोटो : amar ujala
तब से भगवान श्री गणेश जी की पूजा में तुलसी का प्रयोग नहीं किया जाता है। सभी देवी-देवताओं को शंख से जल चढ़ाना शुभ माना जाता है लेकिन भगवान भोले नाथ पर शंख से जल नहीं चढ़ाया जाता है। इस संबंध में शिवपुराण में बताया गया है कि शंखचूड़ नाम का एक महापराक्रमी दैत्य था। शंखचूड़ दैत्यराज दंभ का पुत्र था। दैत्यराज दंभ ने घोर तपस्या कर विष्णु भगवान से तीनों लोकों के लिए अजेय और महापराक्रमी पुत्र का वर मांगा था।
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शिव पूजा में तुलसी
- फोटो : tulsi shiv puja
उधर शंखचूड़ ने जब बड़ा हुआ तो उसने पुष्कर में घोर तपस्या कर ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर लिया और अजेय होने का वरदान प्राप्त कर लिया। इसके लिए बृह्मा जी ने उसे श्रीकृष्ण कवच दिया और धर्मात्मज की कन्या तुलसी से विवाह करने की आज्ञा दी। ब्रह्मा जी के आदेशानुसार तुलसी और शंखचूड़ का विवाह हो गया। ब्रह्मा और विष्णु के वरदान के मद में चूर शंखचूड़ ने तीनों लोकों पर स्वामित्व स्थापित कर लिया। भगवान विष्णु ने खुद शंखचूड़ के पिता दंभ को ऐसे पुत्र का वरदान दिया था इसलिए देवताओं की मदद नही कर सकते थे। सभी देवता शिव जी के पास पहुंचे।
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lord shiva
श्रीकृष्ण कवच और तुलसी के पतिव्रत धर्म की वजह से शिवजी भी उसका वध करने में सफल नहीं हो पाए तो भगवान विष्णु ने ब्राह्मण का रूप धरकर शंखचूड़ से श्रीकृष्णकवच दान में ले लिया। इसके बाद शंखचूड़ का रूप धरकर तुलसी के शील का हरण कर लिया। इसी दौरान शिव शंकर मे शंखचूड़ को अपने त्रिशुल से भस्म कर दिया और उसकी हड्डियों से शंख का जन्म हुआ। चूंकि शंखचूड़ विष्णु भक्त था इसलिए लक्ष्मी-विष्णु को शंख का जल अति प्रिय है।