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हिन्दू नववर्ष 2018: जानिए नव संवत्सर का महत्व और कैसे जुड़ा है ग्रह नक्षत्रों से इसका इतिहास
Wed, 21 Mar 2018 11:04 AM IST
पूनम नेगी
पूनम नेगी
Updated Wed, 21 Mar 2018 11:04 AM IST
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दुनिया के तमाम देशों में नया साल व्यक्ति विशेष, घटना, वर्ग, सम्प्रदाय या देश के गौरव से जुड़ी किसी घटना पर आधारित होता है। एक भारतीय नववर्ष ही है, जिसकी गणना और निर्धारण, तारों, ग्रहों, नक्षत्रों, चांद, सूरज आदि की गति का अध्ययन कर, छह ऋतुओं और 12 महीनों के हिसाब से तय हुई है। सूर्य-चंद्र और ग्रह-नक्षत्रों की गति पर आधारित महीने का नाम रखा गया है। जैसे चित्रा नक्षत्र के आधार पर चैत्र, विशाखा के आधार पर बैसाख, ज्येष्ठा के आधार पर ज्येष्ठ, उत्तराषाढ़ा पर आषाढ़, श्रवण के आधार पर श्रावण आदि।
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भारतीय विद्वानों ने हजारों साल पहले बता दिया था कि अमुक दिन, अमुक समय सूर्यग्रहण होगा। युगों बाद भी यह गणना सही और सटीक साबित हो रही है। यह इतनी सामंजस्यपूर्ण है कि तिथि वृद्धि, तिथि क्षय, अधिक मास, क्षय मास आदि व्यवधान उत्पन्न नहीं कर पाते। तिथि घटे या बढ़े, लेकिन सूर्यग्रहण सदैव अमावस्या को होगा और चंद्रग्रहण सदैव पूर्णिमा को ही होगा। इस आधार पर दिन-रात, सप्ताह, पखवाड़ा, महीने, साल और ऋतुओं का निर्धारण हुआ। बारह महीनों और छह ऋतुओं के चक्र यानी पूरे वर्ष की अवधि को संवत्सर नाम दिया।
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भारतीय परंपरा में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण तिथि है। ब्रह्मपुराण में उल्लेख है कि चैत्र प्रतिपदा को ही ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी। यूं भी कह सकते हैं कि जिस दिन दुनिया अस्तित्व में आई, उसी दिन प्रतिपदा मानी गई। गणना का आधार सूर्य के स्थान पर चंद्रमा को बनाया गया। आज भी ग्रामीण इलाकों में लोग रात के चंद्रमा की गति देखकर समय व तिथि का अनुमान सहज ही लेते हैं।
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प्राचीन उल्लेख बताते हैं कि सम्राट विक्रमादित्य ने प्रजा को ऋण मुक्त करने के साथ अनेक जनहित के काम शुरु कराए थे। उसी कारण सांस्कृतिक पुरुषों की धर्म संसद ने नया संवत चलाने का अधिकार दिया। इसके बाद भारत की सीमाओं को सुरक्षित कर, राष्ट्र ने अपने प्रिय सम्राट के नाम पर विक्रमी संवत शुरू करने का अधिकार दिया।
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चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के जिस दिन (वार) से विक्रमी संवत शुरू होता है, वही इस संवत का राजा होता है। सूर्य जब मेष राशि में प्रवेश करता है, तो वह संवत का मंत्री होता है। सूर्य की अन्य संक्रान्तियां वर्ष की सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक स्थितियों का निर्धारण करती हैं। इसी कारण विक्रम संवत समस्त संस्कारों, पर्वों एवं त्योहारों की रीढ़ माना जाता है। समस्त शुभ कार्य इसी पंचांग की तिथि से ही किए जाते हैं। किसी शुभ कार्य को सम्पन्न करने के लिए जब हम देवशक्तियों का आह्वान करते हैं, उसके पूर्व एक संकल्प मंत्र बोला जाता है। इस संकल्प मंत्र में कालगणना का ही पुण्य स्मरण किया जाता है।
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