हिंदू नववर्ष: चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नव संवत 2079 आरंभ, वैज्ञानिक सत्य पर आधारित है भारतीय संवत और काल गणना
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भारतीय नववर्ष का मंत्री मण्डल कैसा ?
भारतीय नववर्ष का मंत्री मण्डल इस प्रकार है- वर्ष का राजा शनि,मंत्री गुरु,सस्येश (ग्रीष्म कालीन फसलों के स्वामी)शनि,धान्येश (खाद्य मंत्री)शुक्र,मेघेश (वर्षा के स्वामी) बुध,रसेश चन्द्रमा,नीरशेष (धातुओं के स्वामी) शनि,फलेश (फलों के स्वामी) मंगल,धनेश (वित्तमंत्री) शनि व दुर्गेश (सेना पति -रक्षा मंत्री)बुध होंगे। इस प्रकार नए वर्ष के मंत्री मण्डल में चार महत्वपूर्ण पद शनि को प्राप्त हुए है अर्थात मंत्रिमंडल में शनि का आधिपत्य रहेगा। पूरे दशाधिकारियों में पांच पद शुभ व पांच पद अशुभ ग्रहों को प्राप्त हुए है अतः नववर्ष देशवासियों के लिए मिश्रित फलदायी रहेगा। आचार्य पण्डित रामचंद्र शर्मा वैदिक के अनुसार सृष्टि की रचना व संहार का कारक है काल है ये ही शुभ एवं अशुभ स्तिथियां पैदा करता है। काल पुरुष की आत्मा सूर्य,मन चन्द्रमा,सत्व मंगल,वाणी बुध,ज्ञान सुख गुरु व शनि दुःख है। यही हमारा मंत्रिमंडल के विभाजन का स्वरूप भी है।
हमारी काल गणना निर्दोष व वैज्ञानिक
ज्योतिर्विज्ञान के अनुसार जो काल विभाग सभी ऋतुओं व प्राणियों का आधार है वही संवत्सर कहलाता है। संवत्सर से तात्पर्य समस्त छः ऋतुओं का एक पूर्ण चक्र काल गणना में संवत्सर की ही प्रधानता है। हमारी काल गणना निर्दोष व वैज्ञानिक भी है। आचार्य शर्मा वैदिक ने बताया कि हमारा भारतीय विक्रम संवत्सर चैत्र मास व वसन्त ऋतु से प्रारम्भ होता है। वैदिक विज्ञान के अनुसार चैत्र का दूसरा नाम है मधु। इस माह में मधुरस उत्पन्न होता है जिससे वृक्ष,लता आदि पुष्पित व पल्लवित होते हैं। चैत्र मास वसन्त ऋतु में आता है। यह ऋतु फूल पत्तों को नव श्रृंगार प्रदान करती है अतः पेड़ पौधे पुराने पत्तों का त्यागकर नए पत्ते धारण करते हैं। विक्रम के नए सभी माह आकाशीय नक्षत्रों के उदय अस्त से सम्बन्ध रखते है व तिथि व दिन सूर्य चन्द्र की गति पर निर्भर है। नए वर्ष में पंचांग श्रवण करने की भी परम्परा रही है। राजा महाराजा इससे नव संवत्सर का भविष्य जानते थे। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की कुंडली से देश का भविष्य भी जाना जाता है।
घोड़े पर सवार होकर मां का आगमन
आचार्य शर्मा वैदिक ने वर्ष प्रतिपदा से वासन्तिक नवरात्रि का आरम्भ होता है। इस वर्ष देवी आराधना के पूरे नौ दिन है। 02 अप्रैल को घटस्थापना होगी और 10 अप्रैल को रामनवमी के साथ समापन। नवरात्रि में मां घोड़े पर सवार हो आएगी और भैंसे पर सवार हो जाएगी। संहिता ग्रन्थों में घोड़े को युद्ध व भैंसे को रोग,कष्ट व दुःख का प्रतीक बताया है। धर्मशास्त्रों की मान्यता है कि गुड़ी पड़वा(वर्ष प्रतिपदा)को अपने अपने घरों में ध्वजा लगाना चाहिए। ध्वजा ऐश्वर्य व विजय का प्रतीक है। आज के दिन वर्ष के स्वामी अर्थात ब्रह्माजी का पूजन भी करना चाहिए। प्रातः तेल लगाकर स्नान करने का भी महत्व बताया गया है।आज के दिन नीम की कच्ची कोपलों में हींग,जीरा नमक ,अजवाइन और कालीमिर्च के सेवन का भी महत्व बताया गया। आयु्र्वेद की मान्यता है कि इसके सेवन से वर्ष भर निरोगता बनी रहती है।
आचार्य शर्मा ने बताया कि भारतीय भुकेन्द्र पर 1 अप्रैल 22 शुक्रवार को 11.53 पर अमावस्या का अंत होकर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का आरम्भ मेष लग्न में होगा। अतः ज्योतिषीय मान से नया नल नामक संवत्सर का आरम्भ मेष लग्न में हो रहा है। वर्ष का राजा शनि व गुरु मंत्री होंगे। नए विक्रम संवत्सर में 5 पद शुभ व 5 ही पद अशुभ ग्रहों को प्राप्त हुए है। अतः नया भारतीय संवत्सर देश के लिए मिलाजुला रहेगा। इस प्रकार हमारी काल गणना वैज्ञानिक सत्य पर आधारित है।
लेखक- आचार्य पण्डित रामचंद्र शर्मा वैदिक,अध्यक्ष मध्यप्रदेश ज्योतिष एवं विद्वत परिषद, इंदौर।