वर्षों से देश के अलग-अलग भागों में पौराणिक कथाओं के खलनायकों रावण, कंस, जरासंध, दुर्योधन की पूजा चली आ रही है। इतना ही नहीं इन खलनायकों के मंदिर भी मौजूद हैं। मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी के संसद में दिए बयान के बाद मुद्दा सड़क से लेकर संसद तक चर्चा का विषय बना हुआ है।
आइये देखें कि इस विषय पर हमारे पुराण क्या कहते हैं। पं जयगोविंद शास्त्री बताते हैं कि जिस महिषासुर को भगवान बनाने की कोशिश की जा रही है उसका जिक्र देवी भाग्वत् पुराण, कालिका पुराण, दुर्गा सप्तशती में है। इस असुर की वंश परंपरा और जन्म की कथा का उल्लेख देवी भाग्वत् पुराण में किया गया है। पुराण के अनुसार इसके दादा 'दनु' थे जिनकी संतान दानव कहलाए।
दनु का एक महाबलशाली पुत्र हुआ जो रंभ कहलाया। रंभ का मन त्रिहायिणी नाम की एक महिषी यानी भैस पर आ गया। रंभ और त्रिहायिणी के संयोग से महिषासुर का जन्म हुआ। इसलिए महिषासुर कभी भी भैंस का रूप धारण कर सकता था। महिषासुर का पुत्र हुआ गजासुर। इसी गजासुर के सिर काटकर गणेश जी को पुर्नजीवन दिया गया।
ऐसे में तीनों लोकों के कष्ट को दूर करने के लिए महिषासुर का वध करने के लिए एक स्त्री शक्ति को प्रकट करने की योजना त्रिदेवों ने बनाई और आदिशक्ति नारी रूप में प्रकट हुई। महिषासुर का वध करने से पहले यह देवी ऋषि कात्यायन के घर पहुंची जिसे देवी ने पुत्री रूप में पाने का वरदान दिया था।
6 दिनों तक इनके घर में रहने के बाद देवी ने ऋषि को अपनी वास्तविकता बताई और महिषासुर का वध करने चल पड़ी। इसलिए महिषासुर का वध करने वाली देवी दुर्गा नहीं कात्यायिनी है जो महिषासुर का वध करने के कारण महिषासुरमर्दिनी कहलाती हैं। आदिशक्ति जब दुर्गम नाम के असुर का वध करने के लिए प्रकट हुई थी तब वह दुर्गा कहलायी।