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Pitru Paksha 2020: जानिए श्राद्ध की परंपरा और किसने किया सबसे पहले पितरों का तर्पण

Mon, 31 Aug 2020 03:58 PM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Mon, 31 Aug 2020 03:58 PM IST
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Pitru Paksha 2020 history of shradh and who did first shradh
पितृपक्ष 2020: पितृपक्ष में पितरों को तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा निभाई जाती है।
प्रत्येक वर्ष भाद्रपद की पूर्णिमा से लेकर अश्विन माह की सर्वपितृ अमावस्या तक पितरों को श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध अर्पण करने की पंरपरा है। इस बार 2 सितंबर से लेकर 17 सितंबर तक पितृपक्ष रहेगा। इस दौरान पितृलोक से सभी पितर देव धरती पर अपने जीवित परिजनों से मिलने और उनको आशीर्वाद देने के लिए आएंगे। पितृपक्ष में पितरों को तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा निभाई जाती है। धर्म ग्रंथों में श्राद्ध के बारे में कई चीजों को विस्तार पूर्वक बताया गया है। पूर्वजों का पिंडदान और उन्हें श्राद्ध देने की परंपरा कैसे और कब से आरंभ हुई आइए जानते हैं। 
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Pitru Paksha

श्राद्ध का पहला उपदेश
महाभारत के अनुशासन पर्व के अनुसार सबसे पहले श्राद्ध का उपदेश अत्रि मुनि ने दिया था। इसके बाद सबसे पहले श्राद्ध महर्षि निमि ने किया था। बाद में धीरे-धीरे कई अन्य महर्षि भी श्राद्ध कर्म करने लगे और पितरों को अन्न का भोग लगाने लगे। जैसे-जैसे श्राद्ध की परंपरा बढ़ती गई देवता और पितर धीरे-धीरे पूर्ण रूप से तृप्त होते गए। जिसके बाद उन्हें भोजन को पचाने की समस्या सामने आने लगी।

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श्राद्ध में रोग का शिकार हो थे पितर और देवता
लगातार श्राद्ध का भोजन करने से पितरों को भोजन का न पचना एक रोग का रूप धारण कर लिया। तब पितर और देवता सभी मिलकर ब्रह्राजी के पास उपाय मांगने गए। तब ब्रह्राजी ने देवताओं और पितरों की बातें सुनकर कहा कि आपकी समस्या का समाधान अग्निदेव करेंगे।
 
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श्राद्ध में अग्नि का महत्व
देवताओं और पितरों की समस्या को सुनकर अग्नि देव ने कहा अब से श्राद्ध में हम सभी एक साथ भोजन ग्रहण करेंगे। मेरे साथ भोजन करने पर भोजन के पचाने की समस्या दूर हो जाएगी। इसके बाद से ही सबसे पहले श्राद्ध का भोजन अग्नि को, फिर बाद में पितरों का दिया जाता है।

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सबसे पहले पिता को तर्पण
ग्रंथों के अनुसार, श्राद्ध कर्म में अग्नि देव के उपस्थित होने पर राक्षस वहां से दूर भाग जाते हैं। हवन करने के बाद सबसे पहले निमित्त पिंडदान करना चाहिए। सबसे पहले पिता को, उसके बाद दादा को फिर परदादा को तर्पण करना चाहिए। अमावस्या की तिथि पर श्राद्ध जरूर करना चाहिए।
 
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