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नागपंचमी: शेषनाग नहीं ये हैं नागों के राजा, बहन की शादी करवाकर बचाई थी सांपों की जान

Thu, 27 Jul 2017 09:24 AM IST
amarujala.com- presented by: विनोद शुक्ला
amarujala.com- presented by: विनोद शुक्ला Updated Thu, 27 Jul 2017 09:24 AM IST
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 nag panchami 2017: how to snakes birth in our earth and history

हिन्दू धर्म में नागों की विशेष रूप से पूजा की जाती है और इन्हें देवता के रूप में भी पूजा जाता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार सावन मास की शुक्ल पंचमी को नागपंचमी का त्यौहार मनाया जाता है। इस बार यह उत्सव 27 जुलाई को है। इस धरती पर नागों की उत्पत्ति कैसे हुई इसका वर्णन हमारे ग्रंथो में किया गया है। इनमे वासुकि, शेषनाग,तक्षक और कालिया जैसे नाग है। नागों का जन्म ऋषि कश्यप की दो पत्नियों कद्रु और विनता से हुआ था।

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शेषनाग- शेषनाग का दूसरा नाम अनन्त भी है। शेषनाग ने अपनी दूसरी माता विनता के साथ हुए छल के कारण अपनी माता को छोड़कर गंधमादन पर्वत पर तपस्या की थी। तब तपस्या कारण ब्रह्राजी ने उन्हें वरदान दिया था। तभी से शेषनाग ने पृथ्वी को अपने फन पर संभाले हुए है। धर्म ग्रंथो में लक्ष्मण और बलराम को शेषनाग के ही अवतार माना गया है। शेषनाग भगवान विष्णु के सेवक रुप क्षीर सागर में रहते हैं।

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वासुकि नाग- नाग वासुकि को समस्त नागों का राजा माना जाता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार समुद्रमंथन के समय नागराज वासुकि को रस्सी के रूप में प्रयोग किया गया था। त्रिपुरदाह यानि युद्ध में भगवान शिव ने एक ही बाण से राक्षसों के तीन पुरों को नष्ट कर दिया था के समय वासुकि शिव धनुष की डोर बने थे। नाग वासुकि को जब पता चला कि नागकुल का नाश होनेवाला है और उसकी रक्षा इसके भगिनीपुत्र द्वारा ही होगी तब इसने अपनी बहन जरत्कारु को ब्याह दी। इस तरह से उन्होनें सापों की रक्षा की, नहीं तो समस्त नाग उसी समय नष्ट हो गये होते।

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तक्षक नाग- तक्षक नाग के बारे में महाभारत में  एक कथा है। उसके अनुसार श्रृंगी ऋषि के श्राप के कारण तक्षक नाग ने राजा परीक्षित को डसा था जिससे उनकी मृत्यु हो गई थी। तक्षक से बदला लेने के उद्देश्य से राजा परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने सर्प यज्ञ किया था। इस यज्ञ में अनेक सर्प आ-आकर गिरने लगे। तब आस्तीक मुनि ने तक्षक के प्राणों की रक्षा की थी। तक्षक ही भगवान शिव के गले में लिपटा रहता है।

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ककोंटक नाग- कर्कोटक शिव के एक गण हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार,अपनी माता के शाप से बचने के लिए सारे नाग अलग-अलग जगहो में यज्ञ करने चले गए। कर्कोटक नाग ने ब्रह्राजी के कहने पर महाकाल वन में महामाया के सामने स्थित शिवलिंग की पूजा की। शिव ने प्रसन्न होकर कहा- जो नाग धर्म का आचरण करते हैं, उनका विनाश नहीं होगा।

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