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Gupt Navratri 2025 Second Day: गुप्त नवरात्रि के दूसरे दिन की जाती है मां तारा देवी की पूजा, जानें इनकी कथा
Fri, 31 Jan 2025 12:26 PM IST
ज्योति मेहरा
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: ज्योति मेहरा
Updated Fri, 31 Jan 2025 12:26 PM IST
सार
देवी तारा को महाविद्याओं में दूसरा स्थान प्राप्त है और यह मां काली का ही एक स्वरूप मानी जाती हैं। देवी तारा की छवि अत्यंत उग्र और प्रभावशाली होती है। वे नर-मुंडों की माला धारण करती हैं और तंत्र साधना में इनकी पूजा का विशेष स्थान है।
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गुप्त नवरात्रि के दूसरे दिन की जाती है मां तारा देवी की पूजा
- फोटो : Amar Ujala
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Mahavidya Tara Devi Story in Hindi: हिंदू धर्म में गुप्त नवरात्रि का विशेष महत्व है, और इसके दूसरे दिन देवी तारा की उपासना की जाती है। देवी तारा को महाविद्याओं में दूसरा स्थान प्राप्त है और यह मां काली का ही एक स्वरूप मानी जाती हैं। देवी तारा की छवि अत्यंत उग्र और प्रभावशाली होती है। वे नर-मुंडों की माला धारण करती हैं और तंत्र साधना में इनकी पूजा का विशेष स्थान है। इन्हें मुक्ति प्रदान करने वाली देवी भी कहा जाता है।
मां तारा के स्वरूप और शक्तियां
- फोटो : amar ujala
मां तारा के स्वरूप और शक्तियां
देवी तारा के तीन प्रमुख स्वरूप माने जाते हैं- उग्र तारा, एकजटा और नील सरस्वती।
उग्र तारा- यह स्वरूप अत्यंत उग्र और शक्तिशाली होता है, जो संहार और विनाश का प्रतीक है।
एकजटा- यह स्वरूप साधकों को आत्मज्ञान और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है।
नील सरस्वती- इस रूप में देवी ज्ञान, विद्या और वाणी की अधिष्ठात्री हैं और साधकों को बौद्धिक उन्नति प्रदान करती हैं।
देवी तारा के तीन प्रमुख स्वरूप माने जाते हैं- उग्र तारा, एकजटा और नील सरस्वती।
उग्र तारा- यह स्वरूप अत्यंत उग्र और शक्तिशाली होता है, जो संहार और विनाश का प्रतीक है।
एकजटा- यह स्वरूप साधकों को आत्मज्ञान और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है।
नील सरस्वती- इस रूप में देवी ज्ञान, विद्या और वाणी की अधिष्ठात्री हैं और साधकों को बौद्धिक उन्नति प्रदान करती हैं।
मां तारा की उत्पत्ति से जुड़ी पौराणिक कथा
- फोटो : adobe stock
मां तारा की उत्पत्ति से जुड़ी पौराणिक कथा
देवी तारा की उत्पत्ति से संबंधित कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार, मेरु पर्वत के पश्चिम भाग में स्थित चोलना नदी के तट पर देवी तारा का प्राकट्य हुआ था। हयग्रीव नामक दैत्य के वध के लिए मां महाकाली ने नीलवर्ण धारण किया और उनके इस रूप को तारा देवी के रूप में पूजा जाने लगा।
महाकाल संहिता में बताया गया है कि चैत्र शुक्ल अष्टमी को देवी तारा प्रकट हुई थीं, इसलिए इस तिथि को "तारा अष्टमी" कहा जाता है। इसके अलावा, चैत्र शुक्ल नवमी की रात को "तारा रात्रि" के रूप में मनाया जाता है।
देवी तारा की उत्पत्ति से संबंधित कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार, मेरु पर्वत के पश्चिम भाग में स्थित चोलना नदी के तट पर देवी तारा का प्राकट्य हुआ था। हयग्रीव नामक दैत्य के वध के लिए मां महाकाली ने नीलवर्ण धारण किया और उनके इस रूप को तारा देवी के रूप में पूजा जाने लगा।
महाकाल संहिता में बताया गया है कि चैत्र शुक्ल अष्टमी को देवी तारा प्रकट हुई थीं, इसलिए इस तिथि को "तारा अष्टमी" कहा जाता है। इसके अलावा, चैत्र शुक्ल नवमी की रात को "तारा रात्रि" के रूप में मनाया जाता है।
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भगवान शिव
- फोटो : freepik
भगवान शिव और मां तारा की चर्चा
एक अन्य कथा के अनुसार, भगवान शिव ने मां पार्वती को बताया कि आदि काल में जब रावण का संहार किया गया, तब देवी ने अत्यंत उग्र रूप धारण किया था। इस दौरान देवी ने अपने हाथों में खड़ग, नरमुंड, वरदान मुद्रा और अभय मुद्रा को धारण किया था। उनके मुख से विकराल जिह्वा बाहर निकली हुई थी, और उनका भयावह रूप देखकर देवतागण भी भयभीत हो गए थे। देवताओं ने जब देवी तारा के इस प्रचंड रूप को देखा, तो वे अत्यंत भयभीत हो गए और सभी देवगण उनकी स्तुति करने लगे। भगवान ब्रह्मा स्वयं उन्हें शांत करने के लिए उनके पास गए।
एक अन्य कथा के अनुसार, भगवान शिव ने मां पार्वती को बताया कि आदि काल में जब रावण का संहार किया गया, तब देवी ने अत्यंत उग्र रूप धारण किया था। इस दौरान देवी ने अपने हाथों में खड़ग, नरमुंड, वरदान मुद्रा और अभय मुद्रा को धारण किया था। उनके मुख से विकराल जिह्वा बाहर निकली हुई थी, और उनका भयावह रूप देखकर देवतागण भी भयभीत हो गए थे। देवताओं ने जब देवी तारा के इस प्रचंड रूप को देखा, तो वे अत्यंत भयभीत हो गए और सभी देवगण उनकी स्तुति करने लगे। भगवान ब्रह्मा स्वयं उन्हें शांत करने के लिए उनके पास गए।
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मां तारा की साधना और लाभ
- फोटो : freepik
मां तारा की साधना और लाभ
देवी तारा की पूजा विशेष रूप से तांत्रिक साधकों द्वारा की जाती है। माना जाता है कि इनकी साधना से व्यक्ति को भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती हैं। मां तारा की कृपा से साधक अपने जीवन की समस्त बाधाओं को दूर कर सकता है।
माघ गुप्त नवरात्रि की तिथियां
नवरात्रि प्रतिपदा- 30 जनवरी 2025, गुरुवार - मां काली
नवरात्रि द्वितीया- 31 जनवरी 2025, शुक्रवार - मां तारा
नवरात्रि तृतीया- 1 फरवरी 2025, शनिवार - मां त्रिपुर सुंदरी
नवरात्रि चतुर्थी- 2 फरवरी 2025, रविवार - मां भुवनेश्वरी
नवरात्रि पंचमी- 2 फरवरी 2025 रविवार - मां भैरवी
नवरात्रि षष्ठी- 3 फरवरी 2025, सोमवार - मां छिन्नमस्ता
नवरात्रि सप्तमी- 4 फरवरी 2025, मंगलवार- मां धूमावती
नवरात्रि अष्टमी- 5 फरवरी 2025, बुधवार - मां बगलामुखी
नवरात्रि नवमी- 6 फरवरी 2025, गुरुवार - मां मातंगी
नवरात्रि दशमी- 7 फरवरी 2025, शुक्रवार - मां कमला
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): ये लेख लोक मान्यताओं पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।
देवी तारा की पूजा विशेष रूप से तांत्रिक साधकों द्वारा की जाती है। माना जाता है कि इनकी साधना से व्यक्ति को भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती हैं। मां तारा की कृपा से साधक अपने जीवन की समस्त बाधाओं को दूर कर सकता है।
माघ गुप्त नवरात्रि की तिथियां
नवरात्रि प्रतिपदा- 30 जनवरी 2025, गुरुवार - मां काली
नवरात्रि द्वितीया- 31 जनवरी 2025, शुक्रवार - मां तारा
नवरात्रि तृतीया- 1 फरवरी 2025, शनिवार - मां त्रिपुर सुंदरी
नवरात्रि चतुर्थी- 2 फरवरी 2025, रविवार - मां भुवनेश्वरी
नवरात्रि पंचमी- 2 फरवरी 2025 रविवार - मां भैरवी
नवरात्रि षष्ठी- 3 फरवरी 2025, सोमवार - मां छिन्नमस्ता
नवरात्रि सप्तमी- 4 फरवरी 2025, मंगलवार- मां धूमावती
नवरात्रि अष्टमी- 5 फरवरी 2025, बुधवार - मां बगलामुखी
नवरात्रि नवमी- 6 फरवरी 2025, गुरुवार - मां मातंगी
नवरात्रि दशमी- 7 फरवरी 2025, शुक्रवार - मां कमला
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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): ये लेख लोक मान्यताओं पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।