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क्यों मनाई जाती है हरछठ, जानिए व्रत का महत्व, पूजा विधि और कथा

Tue, 01 Sep 2026 04:33 PM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Tue, 01 Sep 2026 04:33 PM IST
सार

हरछठ का पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद महीने की कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। यह त्योहार विशेष रूप से उत्तर भारत में मनाया जाने वाला पर्व है। हर षष्ठी व्रत को ललही छठ और चंदन छठ के नाम से भी मनाया जाता है।

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harchat 2026 date time puja vidhi samagri list and significance in hindi
हरछठ 2026 - फोटो : amar ujala

विस्तार

हरछठ का त्योहार इस बार बुधवार, 2 सितंबर 2026 को मनाया जा रहा है। हिंदू पंचांग के अनुसार यह त्योहर हर वर्ष भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष को मनाया जाता है। इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी आयु और अच्छी सेहत के लिए पूरे दिन व्रत रखती हैं और विधि विधान के साथ पूजन-अर्चन करती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई  बलराम की पूजा होती है। ऐसे में इस दिन विशेष रूप से भगवान बलराम की पूजा-अर्चना होती है। हिंदू पंचांग के अनुसार यह त्योहार हर वर्ष भाद्रपद महीने की कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। यह त्योहार विशेष रूप से उत्तर भारत में मनाया जाने वाला पर्व है। हर षष्ठी व्रत को ललही छठ और चंदन छठ के नाम से भी मनाया जाता है। इस दिन भगवान बललाम के विशेष अस्त्र हल और मूसल की पूजा करने का विधान होता है। इसमें व्रती महिलाएं अपने संतान की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और परिवार की मंगलकामना के लिए व्रत रखती हैं। हरषष्ठी के दिन माताएं महुआ का दातून या फिर महुआ खाने की परंपरा होती है। 

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हरछठ व्रत का महत्व
हिंदू धर्म में संतान की मंगलकामना के लिए भाद्रपद माह के कृष्णपक्ष की षष्ठी तिथि पर हरषष्ठी का व्रत रखा जाता है। इस व्रत को रखने और भगवान बलराम की पूजा करने से संतान के सुख-समृद्धि और दीर्घायु का आशीर्वाद मिलता है। इसके अलावा इस व्रत को करने से परिवार में सुख-शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है। 
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व्रत की विधि
हरछठ के दिन महिलाएं सुबह जल्दी स्नान करके साफ-सुधरे वस्त्र पहनने। इसके बाद घर के बाहर या फिर आंगन में एक चौक बनाकर उसमें हल और भगवान बलराम के प्रतीक को बनाकर पूजा करें। फिर पूजा में आम पूजन सामग्री से हटकर दूसरी सामग्री का इस्तेमाल करें। इस व्रत में इस दिन हल का उपयोग करने की मनाही हैं जिसके कारण व्रती महिलाएं बिना हल के निकले हुए अनाज और फलों की सेवन करती हैं  जिसमें खास तौर पर फसई के चावल और महुआ का फल ग्रहण किया जाता है। 

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हरछठ व्रत कथा
हरछठ व्रत से संबंधित एक पौराणिक कथा है जिसके अनुसार, एक बार भगवान श्रीकृष्ण के भाई बलराम जी के जन्म से पहले माता रोहिणी ने यह व्रत रखा था। इस व्रत के प्रभाव से ही बलराम जी को अत्यधिक बलशाली और दीर्घायु होने का वरदान मिला। वहीं एक दूसरी कथा भी है, जिसके अनुसार एक ग्वालिन दूध-दही बेचा करती थी। एक बार वह गर्भवती दूध बेचने जा रही थी तभी रास्ते में उसे प्रसव पीड़ा होने लगी। इस पर वह एक झरबेरी पेड़ के नीचे बैठ गई और वहीं पर एक पुत्र को जन्म दिया। ग्वालिन को दूध खराब होने की चिंता थी इसलिए वह अपने पुत्र को पेड़ के नीचे सुलाकर पास के गांव में दूध बेचने के लिए चली गई। उस दिन हरछठ का व्रत था और सभी को भैंस का दूध चाहिए था लेकिन ग्वालिन ने लोभवश गाय के दूध को भैंस का बताकर सबको दूध बेच दिया। इससे छठ माता को क्रोध आया और उन्होंने उसके बेटे के प्राण हर लिए। ग्वालिन जब लौटकर आई तो रोने लगी और अपनी गलती का अहसास किया। इसके बाद हर छठ माता प्रसन्न हो गई और उसके पुत्र को जीवित कर दिया। इस वजह से ही इस दिन पुत्र की लंबी उम्र की कामना से  हलछठ का व्रत व पूजन किया जाता है।

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