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मोहरात्रि की महिमा: क्यों श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की रात मानी जाती है सबसे मंगलमयी ?
Tue, 01 Sep 2026 07:19 PM IST
विनोद शुक्ला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Tue, 01 Sep 2026 07:19 PM IST
सार
Krishna Janmashtami 2026: श्री कृष्ण के प्राकट्य के साथ ही स्वर्ग में देवताओं की दुंदुभियां अपने आप बज उठीं तथा सिद्ध और चारण भगवान के मंगलमय गुणों की स्तुति करने लगे।
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Krishna Janmashtami 2026
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
Krishna Janmashtami 2026: जब-जब धरती पर अत्याचार बढ़ा है और धर्म का पतन हुआ है, तब-तब भगवान ने पृथ्वी पर अवतार लेकर सत्य और धर्म की स्थापना की है। भगवान का अवतार मानव के आरोहण के लिए होता है। जगत की रक्षा, दुष्टों का संहार तथा धर्म की पुनर्स्थापना ही प्रत्येक अवतार का उद्देश्य होता है। अवतार का अर्थ अव्यक्त रूप से व्यक्त रूप में प्रादुर्भाव होना है। इसी दिव्य उद्देश्य से श्रीकृष्ण ने भी पृथ्वी पर अवतार लिया।
मध्यरात्रि में हुआ श्रीकृष्ण का दिव्य प्राकट्य
श्री कृष्ण परम पुरुषोत्तम भगवान के रूप में भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और चंद्रमा के वृषभ राशि में स्थित होने पर मध्यरात्रि में प्रकट हुए। उनके जन्म लेते ही दिशाएं स्वच्छ एवं प्रसन्न हो गईं और समस्त पृथ्वी मंगलमय हो उठी। विष्णु के अवतार श्री कृष्ण के प्रकट होते ही कारागार की कोठरी प्रकाश से भर गई। वसुदेव और देवकी के सामने शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए चतुर्भुज भगवान ने अपना दिव्य रूप प्रकट किया। भगवान ने वसुदेवजी से कहा कि अब वे बालक का रूप धारण करेंगे। उन्हें तत्काल गोकुल जाकर नंद के यहां पहुंचा दिया जाए और वहां अभी-अभी जन्मी कन्या को लाकर कंस को सौंप दिया जाए।
खुल गए बंधन, स्वयं राह बनाने लगी यमुना
भगवान की आज्ञा मिलते ही वसुदेवजी की हथकड़ियां खुल गईं, कारागार के दरवाजे अपने आप खुल गए और पहरेदार गहरी निद्रा में सो गए। वसुदेवजी श्री कृष्ण को सूप में रखकर गोकुल की ओर चल पड़े। मार्ग में यमुना श्री कृष्ण के चरणों का स्पर्श करने के लिए ऊपर उठने लगीं। भगवान ने अपने श्रीचरण यमुना की ओर बढ़ा दिए। चरण स्पर्श करते ही यमुना का जल घट गया और वसुदेवजी सहजता से आगे बढ़ गए। गोकुल पहुंचकर उन्होंने बालक कृष्ण को यशोदाजी के पास सुला दिया और उनकी नवजात कन्या को लेकर वापस कंस के कारागार में आ गए।
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कंस के हाथ से छूटी कन्या, खुल गया रहस्य
कंस को जब देवकी के आठवें बच्चे के जन्म का पता चला तो वह कारागार में पहुंचा और कन्या को लेकर उसे पत्थर पर पटककर मारना चाहा। लेकिन वह कन्या कंस के हाथ से छूटकर आकाश में उड़ गई और देवी के रूप में प्रकट होकर बोली-“हे कंस! मुझे मारने से क्या लाभ है? तेरा शत्रु तो गोकुल में पहुंच चुका है।”यह देखकर कंस हतप्रभ और व्याकुल हो गया। श्री कृष्ण के प्राकट्य के साथ ही स्वर्ग में देवताओं की दुंदुभियां अपने आप बज उठीं तथा सिद्ध और चारण भगवान के मंगलमय गुणों की स्तुति करने लगे।
श्रीकृष्ण का ज्ञान मिटाता है जीवन का अज्ञान
श्री कृष्ण ऐसा दिव्य अवतार हैं, जिनके दर्शन मात्र से प्राणियों के घट-घट के संताप और दुःख मिटने की मान्यता है। श्री कृष्ण ने गोकुल और वृंदावन में मधुर मुरली के मोहक स्वर के माध्यम से जीवन में प्रेम और आनंद का संदेश दिया, वहीं कुरुक्षेत्र की रणभूमि में गीता के रूप में सृजनशील जीवन का वह संदेश सुनाया, जो नाम-रूप, रूढ़ि और सांप्रदायिकता से परे है। जब अर्जुन नैराश्य में डूब गए और अपने कर्तव्य को लेकर भ्रमित हो गए, तब श्री कृष्ण ने उनके अज्ञान को दूर कर ऐसा ज्ञान दिया कि वे पुनः उठ खड़े हुए। यही गीता का ज्ञान आज भी निराश और भ्रमित मनुष्य को जीवन में आगे बढ़ने की शक्ति देता है।
धर्मशास्त्रों में चार रात्रियों का विशेष महत्व बताया गया है। दीपावली की रात्रि को कालरात्रि, शिवरात्रि को महारात्रि, होली की रात्रि को अहोरात्रि और श्री कृष्ण जन्माष्टमी की रात्रि को मोहरात्रि कहा गया है। जिनके प्राकट्य मात्र से बंदीगृह के बंधन स्वतः खुल गए, पहरेदार गहरी निद्रा में चले गए और मां यमुना उनके श्रीचरणों का स्पर्श करने के लिए आतुर हो उठीं, ऐसे भगवान श्री कृष्ण का यह अवतार संसार के मोह को दूर करने वाला माना गया है।
जन्माष्टमी की रात जागरण से दूर होता है मोह
जन्माष्टमी की रात्रि को योगेश्वर श्री कृष्ण का ध्यान, उनके नाम का स्मरण अथवा मंत्र का जप करते हुए जागरण करने की धार्मिक मान्यता है। कहा जाता है कि इस प्रकार भगवान का स्मरण करने से मनुष्य का मन संसार की मोह-माया और अनावश्यक आसक्ति से धीरे-धीरे दूर होता है। श्री कृष्ण का जीवन हमें यह संदेश देता है कि जब जीवन में अज्ञान, निराशा और अधर्म का अंधकार छा जाए, तब ज्ञान, सत्य और धर्म का मार्ग ही मनुष्य को प्रकाश की ओर ले जाता है।
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मध्यरात्रि में हुआ श्रीकृष्ण का दिव्य प्राकट्य
श्री कृष्ण परम पुरुषोत्तम भगवान के रूप में भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और चंद्रमा के वृषभ राशि में स्थित होने पर मध्यरात्रि में प्रकट हुए। उनके जन्म लेते ही दिशाएं स्वच्छ एवं प्रसन्न हो गईं और समस्त पृथ्वी मंगलमय हो उठी। विष्णु के अवतार श्री कृष्ण के प्रकट होते ही कारागार की कोठरी प्रकाश से भर गई। वसुदेव और देवकी के सामने शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए चतुर्भुज भगवान ने अपना दिव्य रूप प्रकट किया। भगवान ने वसुदेवजी से कहा कि अब वे बालक का रूप धारण करेंगे। उन्हें तत्काल गोकुल जाकर नंद के यहां पहुंचा दिया जाए और वहां अभी-अभी जन्मी कन्या को लाकर कंस को सौंप दिया जाए।
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खुल गए बंधन, स्वयं राह बनाने लगी यमुना
भगवान की आज्ञा मिलते ही वसुदेवजी की हथकड़ियां खुल गईं, कारागार के दरवाजे अपने आप खुल गए और पहरेदार गहरी निद्रा में सो गए। वसुदेवजी श्री कृष्ण को सूप में रखकर गोकुल की ओर चल पड़े। मार्ग में यमुना श्री कृष्ण के चरणों का स्पर्श करने के लिए ऊपर उठने लगीं। भगवान ने अपने श्रीचरण यमुना की ओर बढ़ा दिए। चरण स्पर्श करते ही यमुना का जल घट गया और वसुदेवजी सहजता से आगे बढ़ गए। गोकुल पहुंचकर उन्होंने बालक कृष्ण को यशोदाजी के पास सुला दिया और उनकी नवजात कन्या को लेकर वापस कंस के कारागार में आ गए।
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कंस के हाथ से छूटी कन्या, खुल गया रहस्य
कंस को जब देवकी के आठवें बच्चे के जन्म का पता चला तो वह कारागार में पहुंचा और कन्या को लेकर उसे पत्थर पर पटककर मारना चाहा। लेकिन वह कन्या कंस के हाथ से छूटकर आकाश में उड़ गई और देवी के रूप में प्रकट होकर बोली-“हे कंस! मुझे मारने से क्या लाभ है? तेरा शत्रु तो गोकुल में पहुंच चुका है।”यह देखकर कंस हतप्रभ और व्याकुल हो गया। श्री कृष्ण के प्राकट्य के साथ ही स्वर्ग में देवताओं की दुंदुभियां अपने आप बज उठीं तथा सिद्ध और चारण भगवान के मंगलमय गुणों की स्तुति करने लगे।
श्रीकृष्ण का ज्ञान मिटाता है जीवन का अज्ञान
श्री कृष्ण ऐसा दिव्य अवतार हैं, जिनके दर्शन मात्र से प्राणियों के घट-घट के संताप और दुःख मिटने की मान्यता है। श्री कृष्ण ने गोकुल और वृंदावन में मधुर मुरली के मोहक स्वर के माध्यम से जीवन में प्रेम और आनंद का संदेश दिया, वहीं कुरुक्षेत्र की रणभूमि में गीता के रूप में सृजनशील जीवन का वह संदेश सुनाया, जो नाम-रूप, रूढ़ि और सांप्रदायिकता से परे है। जब अर्जुन नैराश्य में डूब गए और अपने कर्तव्य को लेकर भ्रमित हो गए, तब श्री कृष्ण ने उनके अज्ञान को दूर कर ऐसा ज्ञान दिया कि वे पुनः उठ खड़े हुए। यही गीता का ज्ञान आज भी निराश और भ्रमित मनुष्य को जीवन में आगे बढ़ने की शक्ति देता है।
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चार रात्रियों में जन्माष्टमी क्यों है ‘मोहरात्रि’धर्मशास्त्रों में चार रात्रियों का विशेष महत्व बताया गया है। दीपावली की रात्रि को कालरात्रि, शिवरात्रि को महारात्रि, होली की रात्रि को अहोरात्रि और श्री कृष्ण जन्माष्टमी की रात्रि को मोहरात्रि कहा गया है। जिनके प्राकट्य मात्र से बंदीगृह के बंधन स्वतः खुल गए, पहरेदार गहरी निद्रा में चले गए और मां यमुना उनके श्रीचरणों का स्पर्श करने के लिए आतुर हो उठीं, ऐसे भगवान श्री कृष्ण का यह अवतार संसार के मोह को दूर करने वाला माना गया है।
जन्माष्टमी की रात जागरण से दूर होता है मोह
जन्माष्टमी की रात्रि को योगेश्वर श्री कृष्ण का ध्यान, उनके नाम का स्मरण अथवा मंत्र का जप करते हुए जागरण करने की धार्मिक मान्यता है। कहा जाता है कि इस प्रकार भगवान का स्मरण करने से मनुष्य का मन संसार की मोह-माया और अनावश्यक आसक्ति से धीरे-धीरे दूर होता है। श्री कृष्ण का जीवन हमें यह संदेश देता है कि जब जीवन में अज्ञान, निराशा और अधर्म का अंधकार छा जाए, तब ज्ञान, सत्य और धर्म का मार्ग ही मनुष्य को प्रकाश की ओर ले जाता है।