यथा गौरी तथा गंगा तस्माद्गौर्यास्तु पूजने। यो विधिर्विहितः सम्यक्सोपि गंगाप्रपूजने।। जैसे गौरी की पूजा की जाती है उसी प्रकार विधि-विधान से माँ गंगा की भी पूजा करनी चाहिए। माँ शक्ति की बहन गंगा के पृथ्वी पर आगमन का पावनपर्व गंगा दशहरा ज्येष्ठ शुक्लपक्ष दशमी रविवार को चित्रा और स्वाति दोनों नक्षत्रों की उपस्थिति में मनाया जाएगा। सनातनधर्म में अपौरुषेय वेदों के अतिरिक्त पुराण-उपनिषद आदि ग्रन्थों में भी आकाश, पाताल और मृत्युलोक (त्रिपथगामिनी) विष्णुपदी माँ गंगा को सभी पवित्र नदियों, तीर्थों, सरोवरों और समुद्रों की परम माता माना गया है। स्कन्द पुराण के अनुसार सतयुग में ध्यान के द्वारा, त्रेतायुग में ध्यान और तप के माध्यम से, द्वापर में ध्यान, तप तथा यज्ञ के द्वारा मोक्ष की प्राप्ति होती थी, परन्तु कलियुग में तो केवल गंगा ही मोक्ष प्रदान करने वाली हैं।
Ganga Dussehra 2021: जानिए गंगा दशहरा का महत्व और पूजा मंत्र
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जिस प्रकार परब्रह्म परमेश्वर सर्वदाशुद्ध, सदापवित्र, निर्विकार हैं, उसी प्रकार गंगाजल भी है इसमें असाध्य रोगों को हरने, जीवन देने और मोक्ष प्राप्ति कराने की क्षमता है । वैदिककाल से ऋषियों ने जलतत्व को सभी कामनाओं का पूरक तथा ब्रह्म के सदृश स्वीकार किया है ।स योऽपो ब्रह्मेत्युपास्त आप्नोति सर्वान् कामान्।(छान्दोग्य उपनिषत)।महाभारत में गंगा को वेद-वेदांत विद्या के साथ ही ज्ञान, क्रिया एवं भक्ति का सार तत्व कहा गया है । वेदवेदान्तविद्यानां सारभूता ही जाह्नवी। भविष्यपुराण में गंगास्नान के लिए सभी काल एवं सभी स्थान पवित्र माने गए हैं। ध्यानं कृते मोक्षहेतुस्त्रेतायां तच्च वै तपः। द्वापरे तद्द्वयं यज्ञाः कलौ गङ्गैव केवलम्।। इसीलिए वेदों-पुराणों में गंगाजल को ब्रह्मजल कहा गया है उसमें सभी भगवतीय गुणों की अवस्थिति भी है जिनके कारण वह अन्य नदियों, जलाशयों से पृथक महत्व रखती हैं।
गंगा का प्राकट्य
गंगा के प्रादुर्भाव का श्रेय परमपिता ब्रह्मा को जाता है क्योंकि आदिकाल में ब्रह्मा जब जी ने सृष्टि की 'मूलप्रकृति' से निवेदन किया कि हे पराशक्ति ! आप सम्पूर्ण लोकों का आदि कारण बनों, मैं तुमसे ही संसार की सृष्टि आरम्भ करूँगा। ब्रह्मा जी के निवेदन पर उन मूलप्रकृति ने गायत्री, सरस्वती, लक्ष्मी, ब्रह्मविद्या, उमा, शक्तिबीजा, तपस्विनी और धर्मद्रवा इन सात रूपों में अभिव्यक्त हुईं। इनमें सातवीं 'पराप्रकृति 'धर्मद्रवा' को सभी धर्मों में प्रतिष्ठित देखकर ब्रह्मा जी ने उन्हें अपने कमण्डलु में धारण कर लिया, वामन अवतार में बलि के यज्ञ के समय जब भगवान श्रीविष्णु का एक चरणआकाश एवं ब्रह्माण्ड को भेदकर ब्रह्मा जी के सामने स्थित हुआ तब ब्रह्मा ने कमण्डलु के जल से श्रीविष्णु के चरणों की पूजा की। पाँव धुलते समय चरण जल हेमकूट पर्वत पर गिरा, वहाँ से भगवान शंकर के पास पहुँचकर वह जल गंगा के रूप मे उनकी जटा में स्थित हो गया।
सातवीं प्रकृति गंगा बहुत काल तक भगवान शंकर की जटा में ही भ्रमण करती रहीं, तत्पश्च्यात सूर्यवंशी राजा दिलीप के पुत्र भागीरथ ने अपने पूर्वज राजा सागर की दूसरी पत्नी सुमति के साठ हज़ार पुत्रों का विष्णु के अंशावतार कपिल मुनि के श्राप से उद्धार करने के लिए शंकर की घोर आराधना की। तपस्या से प्रसन्न होकर शंकर ने गंगा को पृथ्वी पर उतारा। इस प्रकार 'ज्येष्ठ मासे सिते पक्षे दशमी बुध हस्तयोः। व्यतिपाते गरा नन्दे कन्या चन्द्रे बृषे रवौ ।हरते दश पापानि तस्माद् दसहरा स्मृता।।