हिमाचल प्रदेश के दिग्गज नेता और छह बार के मुख्यमंत्री रहे वीरभद्र सिंह का पार्थिव शरीर शनिवार को पंचतत्व में विलीन हो गया। रामपुर के जोगनी बाग में राजकीय सम्मान के साथ शनिवार को उनका अंतिम संस्कार हुआ। देहांत के तीसरे दिन रामपुर में हजारों लोगों ने नम आंखों से राजा साहब को अंतिम विदाई दी। इससे पहले वीरभद्र सिंह के पार्थिव शरीर के सामने पद्म पैलेस में उनके बेटे विक्रमादित्य सिंह का राज्याभिषेक हुआ।
इसी के साथ उन्हें बुशहर रियायत का 123वां राजा चुन लिया गया। बुशहर रियासत के राजा खुद को कृष्ण भगवान के वंशज बताते हैं। मान्यता है कि सराहन में जहां भीमाकाली माता का मंदिर है, वहां पहले शोणितपुर होता था। शोणितपुर राक्षस राजा बाणासुर की राजधानी थी। किंवदंती के अनुसार कृष्ण के पोते अनिरुद्ध ने बाणासुर की पुत्री उषा का हरण इसी स्थान से किया था। यहीं उनका बाणासुर से युद्ध हुआ था। विष्णु पुराण में इसका उल्लेख किया गया है।
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पद्म पैलेस
- फोटो : अमर उजाला
बताते हैं कि बाद में कृष्ण के वंशजों ने यहां शासन किया। वीरभद्र सिंह भी इसी वंश परंपरा से माने जाते रहे हैं। पद्म पैलेस में भी जो कलाकृतियां लगाई गई हैं, वे कृष्ण भगवान और उनकी लीलाओं से संबंधित ज्यादा हैं। पुराणों में इसका आख्यान आता है कि भगवान कृष्ण के पोते अनिरुद्ध सिंह को बाणासुर की पुत्री उषा ने स्वप्न में एक पुरुष आकृति देखी थी जो उसे विचलित कर रही थी।
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पद्म पैलेस
- फोटो : अमर उजाला
उसके कहे अनुसार उसकी सखी चित्रलेखा ने यह चित्रकृति बनाई। यही नहीं, इस चित्रकृति को बनाने के बाद चित्रलेखा अनिरुद्ध सिंह को द्वारिका से उठाकर शोणितपुर खींच लाई। बाद में अनिरुद्ध उसका हरण कर ले जा रहे थे तो बाणासुर से भयानक युद्ध हुआ।
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पद्म पैलेस
- फोटो : अमर उजाला
इसमें भगवान कृष्ण और उनके पोते अनिरुद्ध की की विजय के बाद यहां कृष्णवंशियों ने ही शासन करना शुरू किया। सुंगरा में उषा माता का मंदिर है, जो बाणासुर की बेटी उषा का ही बताया जाता है। वीरभद्र सिंह इसी वंश परंपरा से माने जाते हैं।
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सिहांसन
- फोटो : अमर उजाला
हालांकि, यह दूसरी बात है कि शोणितपुर के बारे में एक मतभेद भी रहा है, जिसके अनुसार कुछ लोगों ने शोणितपुर आसाम की वर्तमान राजधानी गुवाहाटी को भी माना है तो कुछ विद्वान इसे महाराष्ट्र के इटारसी से तीस मील की दूरी पर सोहागपुर रेलवे स्टेशन के निकट बताते हैं।