हिमाचल प्रदेश का अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा देव संस्कृति का अनूठा महासंगम है। दशहरा उत्सव के रूप में इसकी पहचान देश-विदेश में है। उत्सव में सैकड़ों देवी-देवता शामिल होते हैं। इस बार 25 अक्तूबर को शुरू हुए सात दिवसीय कुल्लू दशहरे में इतिहास में पहली बार कोरोना के चलते भगवान रघुनाथ की रथयात्रा में मात्र आठ देवी-देवता और 200 देवलुओं, कारकूनों और राज परिवार के सदस्यों ने भाग लिया। लेकिन कुल्लू में दशहरा उत्सव की शुरुआत 16वीं सदी में तत्कालीन राजा जगत सिंह के समय में हुई थी।
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मुख्य छड़ीबरदार महेश्चर सिंह
राजा ने अपना सारा राजपाठ रघुनाथ के चरणों में सौंप दिया था। खुद भगवान रघुनाथ के मुख्य छड़ीबरदार बन गए। राजपरिवार इस परंपरा को आज भी बखूबी निभा रहा है। बताया जाता है कि भगवान रघुनाथ का आशीष लेने से राजा जगत सिंह का ब्रह्महत्या का दोष धुल गया था। राजा जगत सिंह को कुछ लोगों ने सूचना दी कि पार्वती घाटी के गांव टिप्परी में ब्राह्मण दुर्गादत्त के पास एक सेर सुच्चे मोती हैं।
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कुल्लू दशहरा
- फोटो : अमर उजाला
राजा ने हुक्म दिया कि मणिकर्ण से लौटते समय ब्राह्मण से मोती मांग लिए जाएंगे। दुर्गादत्त अपने मन ही मन सोचने लगा कि यह कैसा राजा जो मुझसे मोती मांग रहा है। वास्तव में उसके पास कोई मोती नहीं थे। लोगों ने ईर्ष्या स्वरूप उसकी शिकायत की थी। ब्राह्मण एक प्रसिद्ध ज्योतिषी भी था। उसने राजा के भय और डर से अपने घर को आग लगा दी और अपने पूरे परिवार को अग्नि के भेंट कर दिया।
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अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा
ब्रह्महत्या के फलस्वरूप राजा को भोजन में रक्त और कीडे़ नजर आने लगे। इस समस्या के समाधान के लिए राज दरबार में राज पुरोहित बुलाकर सुझाव मांगे। कुछ लोगों ने राजा को संदेश दिया कि नग्गर के पास एक महात्मा रहते हैं और केवल दूध का ही सेवन करते है।
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अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा
राजा ने महात्मा से इस समस्या के समाधान के लिए विनती की। महात्मा ने अपने शिष्य दामोदर दास को अयोध्या से रघुनाथ की मूर्ति को लाने को कहा। कुछ समय दामोदर दास अयोध्या में पुजारी का शिष्य बना।