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देव दीपावली: दीपदान से मिलती है मोक्ष की प्राप्ति, जानिए इस व्रत की खास महिमा

Fri, 19 Nov 2021 10:35 AM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: गीतार्जुन गौतम Updated Fri, 19 Nov 2021 10:35 AM IST
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Dev Deepawali: attainment of salvation by lit lamp on dev deepawali in varanai
देव दीपावली - फोटो : अमर उजाला

काशी विद्वत परिषद के अध्यक्ष पद्मश्री प्रो. रामयत्न शुक्ल ने बताया कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय ने तारकासुर का वध करके उन्हें स्वर्ग वापस दिलाया था। तारकासुर के वध के बाद उसके तीनों बेटों ने देवताओं से बदला लेने का फैसला कर लिया। उन्होंने ब्रह्मा जी की तपस्या करके तीन नगर मांगे और कहा की जब यह तीनों नगर जब अभिजित नक्षत्र में एक साथ आ जाएं तब असंभव व्रत, असंभव बाण से बिना क्रोध किए हुए ही उनका वध हो सकेगा।

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उन्होंने देवताओं को परेशान करना शुरू कर दिया और उन्हें स्वर्ग से बाहर निकाल दिया। सभी देवी देवता त्रिपुरासुर से बचने के लिए भगवान शिव की शरण में पहुंचे। देवताओं का कष्ट दूर करने के लिए भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का वध किया। इस खुशी में सभी देवी देवता भगवान शिव की नगर काशी में पधारे और दीप दान किया।
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माना जाता है तभी से काशी में कार्तिक पूर्णिमा के दिन देव दीपावली मनाने की परंपरा चली आ रही है। देवदीपावली पर काशी में दीपदान से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

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भगवान शिव भी आते हैं काशी में दीप जलाने
काशी विद्वत परिषद के मंत्री डॉ. रामनारायण द्विवेदी ने बताया कि माना जाता है कि चतुर्दशी के दिन भगवान शिव और सभी देवी देवता काशी में आकर दीप जलाते हैं। इस दिन स्वयं भगवान आकर दीप जलाते हैं। यदि इस दिन कोई व्यक्ति सच्चे मन से काशी में जाकर दीप जलाता है और भगवान से प्रार्थना करता है तो उसके जीवन की सभी इच्छाएं पूर्ण होती है और मृत्यु के बाद उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

ऐसे करें पूजन
ज्योतिषाचार्य पं. दीपक मालवीय ने बताया कि ब्रह्म मुहूर्त में उठकर निवृत्त होकर अपने आराध्य देवी देवता की पूजा अर्चना के पश्चात कार्तिक पूर्णिमा के व्रत का संकल्प लेना चाहिए। स्नान करके देव दर्शन करके पुण्य अर्जित करना चाहिए। इस दौरान दीप प्रज्वलित करने की परंपरा है। नदियों और सरोवरों में इस दिन दीपदान किया जाता है। पीपल और तुलसी के वृक्षों का दीपक जला कर उनका पूजन किया जाता है। इस दिन प्रतीक के रूप में दान का भी विधान है। फलाहार ग्रहण करके श्री सत्यनारायण भगवान की पूजा से अभीष्ट की प्राप्ति होती है। धर्म शास्त्रों में कार्तिक पूर्णिमा के दिन किए गए दान का फल यज्ञ के समान बताया गया है।

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