धार्मिक नगरी उज्जैन में महाकालेश्वर मंदिर से कुछ ही दूरी पर चौबीस खंबा माता मंदिर स्थित है। जहां पर देवी महामाया और महामाया की मूर्ति स्थापित है। खंभों के एक और देवी महामाया और दूसरी और देवी महालाया विराजमान हैं।
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महामाया और महामाया की मूर्ति
- फोटो : अमर उजाला
इस मंदिर में 12वीं शताब्दी के एक शिलालेख पर लिखा हुआ है कि उस समय के राजा ने यहां पर नागर और चतुर्वेदी व्यापारियों को लाकर बसाया था। नगर की रक्षा के लिए शहर में 24 खंबे भी लगाए गए थे।
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कलेक्टर चढ़ाते हैं नवरात्रि की अष्टमी को मदिरा की धार
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राजा विक्रमादित्य ने यहां पर दोनों देवियों को मदिरा की धार चढ़ाने की परंपरा की शुरुआत की थी। पुराने जमाने में जागीरदार और जमींदारों के द्वारा यहां पर पूजन अर्चन किया जाता था। उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अब नगर कलेक्टर मदिरा की धार दोनों माताओं को चढ़ाते हैं।
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40 देवी और भैरव मंदिरों में मदिरा का भोग लगाया जाता है
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शारदीय नवरात्रि की महाअष्टमी के दिन यहां पर माता का पूजन-अर्चन किया जाएगा। देवी महामाया और महलाया को मदिरा का भोग लगाने के बाद शहर में स्थित लगभग 40 देवी और भैरव मंदिरों में मदिरा का भोग लगाया जाता है। 24 खंबा से आरंभ होने वाली इस यात्रा का समापन अंकपात मार्ग पर स्थित हांडी फोड़ भैरव पर किया जाता है।
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कलेक्टर द्वारा पूजन अर्चन करने के बाद इस प्रकार से बांटी जाती है मदिरा की प्रसाद
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बताया जाता है कि पूर्व के समय में यह द्वार श्री महाकालेश्वर मंदिर जाने का मुख्य प्रवेश द्वार रहा होगा। जो कि उत्तर दिशा की और बना हुआ है। इस द्वार में कुल 24 खंभे लगे हुए हैं, इसीलिए इस क्षेत्र को 24 खंभा माता मंदिर कहा जाता है। यह द्वार विशालकाय है, यहां माता महामाया और महामाया देवी की नित्य पूजा अर्चना की जाती है। पूर्व में यहां पाड़ो की बलि दी जाती थी, लेकिन यह प्रथा कब से थी इसका उल्लेख कही भी नहीं मिलता है, वर्तमान में यहां बलि प्रथा वर्जित है।