एक ऐसी स्त्री जो ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नर्मदा स्नान करती है, देव पूजन में लीन होती है। महादेव, सूर्यदेव और तुलसी को जल अर्पित करने के बाद पक्षियों के लिए अन्नदान करती है। ब्राह्मणों को आदरपूर्वक आमंत्रित कर भोजन कराती है, उन्हें दान-दक्षिणा देती है और फिर एक राजमाता का उत्तरदायित्व निभाते हुए कठिन प्रश्नों और जीवन के पहाड़ों को अपने आत्मबल से हल करती है।
यह कोई काल्पनिक कथा नहीं, ऐतिहासिक सत्य है। नित्य राज्यसभा में बैठकर दुखियों की व्यथा सुनने वाली, पूरी प्रजा और सम्पूर्ण राज्य के लिए देवरा बन जाने वाली यह स्त्री कुछ समय के विश्राम के बाद पुनः शिव आराधना में लीन हो जाती। भोजन के बाद फिर सभा में उपस्थित होकर रात 11 बजे तक राज्य संचालन करती। यह केवल दिनचर्या नहीं, बल्कि एक जीवंत साधना है, जिसमें राष्ट्र, धर्म और प्रजा के प्रति मां अहिल्या का समर्पण स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
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मां अहिल्या शिव की परम भक्त थीं।
- फोटो : अमर उजाला
उनका जीवन केवल शासन तक सीमित नहीं था, वे देश में ब्राह्मणों, प्रजाजन और सेवकों के बीच रहकर उनकी समस्याओं का समाधान करती थीं। मंदिरों का जीर्णोद्धार कर राष्ट्र को सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आधार देती थीं। वे छोटे-छोटे गांवों के छोटे-छोटे मार्गों तक जाती थीं, जहां 'ढाई पग' की चौड़ाई में भी धर्म का दीप जलता है, वहीं मां अहिल्या की दृष्टि हिमालय की चोटियों तक थी। उनकी दूरदृष्टि किसी दूरबीन से नहीं, हृदय की गहराइयों से संचालित होती थी। चाहे केदारनाथ की कठिन घाटियां हों या समुद्र तट पर स्थित रामेश्वरम, सोमनाथ, हर पवित्र स्थल में मां अहिल्या ने धर्मशालाएं, मंदिर और श्रद्धा के स्तंभ निर्मित कर दिए। उन्होंने यह प्रमाणित कर दिया कि यदि निश्चय पवित्र हो, तो कोई भी कार्य असंभव नहीं है। ऊंची पर्वत श्रंखलाओं पर भी मंदिर बन सकता है और समुद्र तट पर भी शिव स्थापित किए जा सकते हैं।
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सोने के झूले में विराजमान महादेव।
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मां अहिल्या शिव की परम भक्त थीं। उन्होंने शिव को केवल पूजा नहीं, अपने जीवन में उतारा। जब अन्य स्थानों पर झूलों में कान्हा की कल्पना होती थी, तब महेश्वर में नर्मदा तट पर सोने के पालने में महादेव झूलते थे। उनके शासनकाल में सोने-चांदी के शिवलिंग बनाए गए, पार्थिव शिवलिंग की पूजा अर्चना आरंभ करवाई गई, जो आज भी उनके भक्ति भाव और कलात्मक सोच का जीवंत उदाहरण है। शिव आदेश को सर्वोपरि मानने वाली मां अहिल्या पर महादेव की कृपा इस प्रकार थी कि महेश्वर का हजारों वर्षों पुराना वटवृक्ष आज भी एक ही तने पर खड़ा है। उसकी कोई भी जड़ पृथ्वी को नहीं छूती और वहीं समाहित नाग-नागिन की आकृतियां आज भी स्पष्ट रूप से देखी जा सकती हैं, जैसे प्रकृति स्वयं उनके उदार चरित्र का प्रमाण दे रही हो।
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मां अहिल्या शिव की परम भक्त थीं।
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मां अहिल्या ने पार्थिव शिवलिंग पूजन की परंपरा केवल श्रद्धा और भक्ति के लिए आरंभ नहीं की थी, बल्कि इसके मूल में उनकी ममता, करुणा और प्रकृति के प्रति गहन संवेदना भी जुड़ी थी। श्रावण मास में जब नर्मदा में जलस्तर चरम पर होता है, तब जल में रहने वाले छोटे-छोटे जीव बह जाया करते थे। श्रद्धालुओं की उपस्थिति भी उस समय सीमित हो जाती थी, जिससे उन जलीय जीवों को अन्न या स्थायित्व मिलना कठिन था। ऐसे में मां साहेब ने इस स्थिति का गहराई से आकलन किया और पार्थिव शिवलिंग तथा आटे के शिवलिंग बनाकर श्रावण मास में महादेव की विशेष पूजा आरंभ करवाई। इस पूजा में हर दिन सवा लाख पार्थिव शिवलिंग बनाए जाते थे और दिन ढलने से पूर्व नर्मदा में विधिपूर्वक प्रवाहित कर दिए जाते थे। यह केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, अपितु जीव संरक्षण की एक दूरदर्शी योजना थी।
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मां अहिल्या शिव की परम भक्त थीं।
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इस कार्य को केवल स्वयं न कर मां साहेब ने ब्राह्मण परिवारों को इसमें सहभागी बनाया। पार्थिव शिवलिंग निर्माण का यह पुनीत कार्य उन्होंने स्थानीय ब्राह्मणों से करवाया और उन्हें राजपुरोहित के रूप में प्रतिष्ठित किया। साथ ही, उन्हें कृषि की भूमि और दैनिक जीवन संचालन हेतु आवश्यक साधन दिए, जिससे वे आत्मनिर्भर बनें और धर्म कार्यों से भी जुड़े रहें। यह आजीविका और सम्मान का ऐसा संगम था, जो सेवा, श्रृद्धा और शासन के त्रिवेणी संगम जैसा प्रतीत होता है। आज भी महेश्वर में ऐसे कई राजपुरोहित ब्राह्मण परिवार हैं, जो इसी परंपरा से जुड़कर अपना जीवन यापन कर रहे हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि मां अहिल्या द्वारा आरंभ की गई यह योजना केवल तत्कालीन परिस्थिति के लिए नहीं थी, बल्कि सतत और सजीव सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा थी।