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Chhatarpur: खजुराहो नृत्य समारोह के 5वें दिन भारतीय संस्कृति की आबोहवा में निकली लय ताल की अमृत यात्रा, Photo

Sat, 24 Feb 2024 08:52 PM IST
अरविंद कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, छतरपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, छतरपुर Published by: अरविंद कुमार Updated Sat, 24 Feb 2024 08:52 PM IST
सार

Chhatarpur 5th day of Khajuraho dance festival Amrit Yatra of Laya Taal took place in Indian culture
Chhatarpur: खजुराहो नृत्य समारोह के 5वें दिन भारतीय संस्कृति की आबोहवा में निकली लय ताल की अमृत यात्रा, Photo
 

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Chhatarpur 5th day of Khajuraho dance festival Amrit Yatra of Laya Taal took place in Indian culture
नृत्य करती महिलाएं - फोटो : अमर उजाला

खजुराहो नृत्य समारोह नृत्य और समकालीन कलाओं का एक ऐसा गुलदस्ता है, जिसके गुलों की सुगन्ध दिन-प्रतिदिन कलानुरागियों के मानस को तिलिस्मी दुनिया में लिए जा रही है। एक ऐसी दुनिया जहां की आबोहवा में भारतीय संस्कृति के संस्कार हैं। जहां आकार को साकार किया जाता है, जहां सात्विकता है शुद्धता है, जहां नव रसों और भावों का समावेश है। इस आबोहवा में चाक पर हाथों से मिट्टी को आकृति प्रदान करना हो या कला साधकों से सीखने की बात हो, लोक का सजीला संसार हो या लय ताल की यात्रा हो, सब कुछ समाहित है। समारोह में नृत्य प्रस्तुतियों के तहत पांचवे दिन पंचानन भुयान, आराधना ओडिसी डांस फाउंडेशन, दिल्ली का छाऊ, ओडिसी, अमीरा पाटनकर एवं साथी, पुणे का कथक, राजश्री होल्ला एवं रेखा सतीश, बैंगलोर का कुचिपुड़ी और अनु सिन्हा एवं साथी, दिल्ली का कथक देख दर्शक मुग्ध हो गए।

Chhatarpur 5th day of Khajuraho dance festival Amrit Yatra of Laya Taal took place in Indian culture
अलग रुप दिखाती महिलाएं - फोटो : अमर उजाला

पहली प्रस्तुति में गुरु श्री पंचानन भुयान और उनके समूह का छाऊ-ओडिसी नृत्य हुआ। श्री पंचानन ने अपने नृत्य की शुरुआत मंगलाचरण से की। शांताकारं भुजगशयनम श्लोक पर भगवान विष्णु को याद किया गया। मर्दल की ताल पर नर्तकों ने भाव प्रवण ढंग से यह प्रस्तुति दी। अगली प्रस्तुति में उन्होंने नृत्य और ताल के अनूठे संगम को पेश किया। रावण नृत्य नाटिका के एक अंश को इस प्रस्तुति में लिया गया था, जिसमें रावण शिव को प्रसन्न करने यज्ञ कर रहा है।

इसमें ओडिसी के साथ मयूर भंज और छाऊ नृत्य शैलियों को भी समाहित किया गया था। इस प्रस्तुति में श्री पंचानन के साथ सुमित मंडल, दीपक कांदारी, जय सिंह, रोहित लाल ने भी नृत्य में साथ दिया। रतिकांत महापात्र की यह नृत्य रचना खूब पसंद की गई। उन्होंने नृत्य का समापन लोकनाथ पटनायक द्वारा रचित उड़िया के भक्ति गीत सजा कंजा नयना कुंजे आ री से किया। राग आहिरी और ताल खेमटा की यह रचना खूब सराही गई। नृत्य रचना गुरु पंचानन और सुश्री प्रिय सामंत राय की थी। इन प्रस्तुतियों में स्निग्ध शिखा पत्त जोशी, बनीता पंडा, इशिता गांगुली, सुदेशना दत्ता, आस्था पांडा, पूजित कटारी, सुमित मंडल, जय सिंह, दीपक कांदारी एवं रोहित लाल ने साथ दिया। जबकि मर्दल पर प्रफुल्ल मंगराज, गायन पर प्रशांत कुमार बेहरा, वायलिन पर गोपीनाथ, बांसुरी पर धीरज कुमार पाण्डे एवं मंजीरा पर प्रशांत कुमार मंगराज ने साथ दिया। 

Chhatarpur 5th day of Khajuraho dance festival Amrit Yatra of Laya Taal took place in Indian culture
नृत्य दिखाते पुरुष - फोटो : अमर उजाला

दूसरी प्रस्तुति पुणे की सुश्री अमीरा पाटनकर और उनके साथियों की कथक नृत्य की रही। उन्होंने राम वंदना से अपने नृत्य का आरंभ किया। मंगलाचरण स्वरूप की गई इस रचना में सीता स्वयंवर सेतु लंघन, रावण दहन की लीला को सुश्री अमीरा व साथियों ने बड़े ही सलीके से नृत्य भावों से पेश किया। अगली प्रस्तुति चतुरंग की थी। राग देश की इस रचना में तराना सरगम, साहित्य, नृत्य के बोलों का अनोखा और सुंदर समन्वय देख दर्शक मुग्ध हो गए। सुश्री अमीरा ने अगली प्रस्तुति में राग पीलू में निबध्द ठुमरी - "ऐसी मोरी रंगी है श्याम" पर भाव नृत्य पेश किया। इसके बाद त्रिविधा में शुद्ध नृत्य के कुछ तत्व दिखाए जिनमें परमेलु और नटवरी बोलों की अनूठी बंदिशें शामिल थी। इन नृत्य रचनाओं की कोरियोग्राफी शमा भाटे की थी। जिनमें अवनि, ईशा, श्रद्धा, श्रेया, परिचिति प्रमोद व नयन ने साथ दिया। जबकि चारुदत्त फड़के ने तबला, सुमित्रा क्षीरसागर ने हारमोनियम, विनय रामदासन ने गायन और अनूप ने वायलिन पर साथ दिया। 

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नृत्य करते हुए - फोटो : अमर उजाला

अगले क्रम में बैंगलोर से आईं राजश्री होल्ला और रेखा सतीश की जोड़ी ने भी अपने कुचिपुड़ी नृत्य से खूब रंग भरे। उन्होंने बतौर मंगलाचरण गणेश वंदना से नृत्य का आगाज किया। आदत और सेत्तो नाता रागम की इस रचना में राजश्री और रेखा ने भगवान गणेश की बुद्धिमता को भावों से सब के सामने रखा। अगली प्रस्तुति में उन्होंने राग मलिका में पगी और मिस्त्र चापू ताल में निबद्ध भक्त प्रहलाद पट्टाभिषेकम की कहानी को नृत्य के जरिए पेश किया। इसमें प्रहलाद की भक्ति हिरण्यकश्यप के वध को ओजपूर्ण भावों से पेश किया गया। राजश्री और रेखा ने दुर्गा तरंगम में महिषासुर मर्दिनी की कहानी को कुचीपुड़ी शैली में अभिव्यंजक अंग संचालन से प्रदर्शित किया। राग सनमुखप्रिया और आदिताल की इस रचना के अंत में नृत्यांगनाओं ने कांस्य थाली पर नृत्य किया।राजश्री और रेखा ने राग अहीर भैरव और आदि ताल की रचना पिबारे राम रसम से राम स्तुति कर नृत्य का समापन किया। ये रचना सदाशिव भ्रमेंद्र की थी जबकि डांस कोरियोग्राफी रेखा सतीश की थी।

सभा का समापन दिल्ली से पधारीं डॉ. अनु सिन्हा और उनके साथियों के कथक नृत्य से हुआ। उन्होंने मंगलाचरण में गणेश वंदना से नृत्य का आरंभ किया। राग देश और चोटी की बंदिश - प्रथम सुमिरन श्री गणेश....के जरिए उन्होंने भगवान गणेश की बुद्धिमता शक्ति और समृद्धि को भावों में पिरोकर पेश किया। अगली प्रस्तुति में उन्होंने "जय राम रमा" पर भगवान राम की महिमा को सामने रखा। भैरवी की इस रचना में प्रेम समर्पण को बड़े ही सलीके से उन्होंने पेश किया। अगली पेशकश शिव आराधना की थी। "शंकर अति प्रचंड" मालकौंस के सुरों में भीगी और चोटी में बंधी इस रचना में उन्होंने शिव के प्रति आस्था और भक्ति के भावों को बड़े ही सजीव भावों में पिरोया। नृत्य का समापन उन्होंने ठुमरी -"ऐसी हठीलो छैल" पर भाव नृत्य से किया। राधा कृष्ण के प्रेम को इस ठुमरी से सजीव करते हुए सुश्री अनु ने रसिकों को मुग्ध कर दिया। कुछ प्रस्तुतियों में उनके साथ मुल्ले अफसर खां ने भी नृत्य किया। जबकि कोमल मिश्र, बृजेश कुमारी, श्रुति गुप्ता, अंशिका भदौरिया, अमान पांडे ने भी नृत्य में सहयोग किया। 

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नृत्य करते हुए - फोटो : अमर उजाला

खजुराहो नृत्य समारोह के दौरान कलावार्ता की चौथी सभा में देश की प्रख्यात कथक नृत्यांगनाएं पद्मश्री नलिनी कमलिनी के साथ कलाविदों को संवाद का अवसर प्राप्त हुए। नृत्य संसार की ऐसी जीवंत जोड़ी जिसने न सिर्फ नृत्य किया, बल्कि उसे जिया। यह कला समाज का सौभाग्य था कि खजुराहो के इस नृत्य समागम के बहाने उन्हें नलिनी कमलिनी जैसी विभूतियों को सुनने का अवसर प्राप्त हुआ। उन्होंने संवाद में नई पीढ़ी के कलाकारों को संबोधित करते हुए कहा कि कला से प्रेम कीजिए, उसके हिस्से का एक-एक पल भी उसे दीजिए, यदि ऐसा करेंगे तो कला आपको वो एक-एक पल लौटाएगी, उसके साथ बेईमानी मत कीजिए, वरना कभी कुछ प्राप्त नहीं होगा। एक कलाकार निराकार को आकार देकर साकार करता है।

कलाकार कृष्ण नहीं, राधा नहीं, लेकिन वह उन्हें आत्मसात करता है तो वही भाव उसके नृत्य में से उमड़ कर आते हैं। उन्होंने अपने गुरु जितेंद्र महाराज को याद करते हुए कहा कि हम अपने गुरु की फिक्र सबसे पहले करते थे। एक वाकया याद करते हुए उन्होंने कहा कि हमारे गुरुजी दिल्ली के करोल बाग की एक बस्ती में रहा करते थे। हम दोनों बहनें अपने गुरुजी के भोजन हेतु अपने घर से नमक, मसाले इत्यादि लेकर जाते थे। उन्होंने कहा कि गुरु के शिष्य नहीं बल्कि उनका विश्वास बनिए, फिर देखिए वह कैसे इसे सार्थक करता है। जीवन में तृप्ति का नहीं, तृष्णा का भाव होना चाहिए, क्योंकि तृप्ति विराम देती है और तृष्णा अग्रसर करती है।

लोकरंजन के चौथे दिन महाराष्ट्र का सोंगी मुखौटा एवं श्री भाविक दान एवं साथी, गुजरात द्वारा गढ़वी गायन की प्रस्तुति दी गई। श्री भाविक दान एवं साथी, गुजरात द्वारा गढ़वी गायन की प्रस्तुति दी गई, जिसमें उन्होंने सोनबाई आई के गीत...,पीठड आई के गीत..., शिवाजी महाराणा प्रताप और चारणी भाषा में दोहा और छंद प्रस्तुति दी। समारोह की शुरुआत सौंगी मुखौटा नृत्य से की गई। सौंगी मुखौटा नृत्य महाराष्ट्र और गुजरात के बीच सीमांत गाँवों में निवास करने वाले जनजातियों का मूल नृत्य है। यह अत्यन्त आकर्षक रंग-बिरंगी वेशभूषा और हाथ में रंगीन डंडे लेकर प्रस्तुत किया जाता है।

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