मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के एक गांव में रहने वाले कुछ लोग खुद को पांडवों का वंशज बताते हैं। साथ ही, मन्नत पूरी करने के नाम पर कांटों पर लेटकर एक परंपरा निभाने का दावा भी करते हैं। ये लोग रज्जड़ समाज से ताल्लुक रखते हैं। बताया जाता है कि इस समाज के लोग कई साल से कांटों की सेज पर लेटने की परंपरा निभा रहे हैं।
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खुद को पांडवों का वंशज बताता है रज्जड़ समाज
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जानकारी के मुताबिक, बैतूल जिले में सेहरा गांव है। यहां हर साल अगहन मास (अंग्रेजी महीने के हिसाब से दिसंबर के आसपास का वक्त) में रज्जड़ समाज के लोग कांटों की सेज पर लेटते हैं। समाज से जुड़े लोगों का दावा है कि वे पांडवों के वंशज हैं। उनका कहना है कि पांडवों ने इसी तरह से कांटों पर लेटकर सत्य की परीक्षा दी थी। ऐसे में रज्जड़ समाज वर्षों से इस परंपरा को निभा रहा है।
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यह है रज्जड़ समाज की मान्यता
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रज्जड़ समाज से जुड़े लोगों का मानना है कि वे कांटों की सेज पर लेटकर अपनी आस्था, सच्चाई और भक्ति की परीक्षा देते हैं। वे कहते हैं कि ऐसा करने से भगवान खुश होते हैं और उनकी मनोकामना भी पूरी होती है।
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खुद तोड़कर लाते हैं कांटे वाली झाड़ियां
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बता दें कि रज्जड़ समाज के लोग अगहन मास में पूजा-अर्चना करते हैं। इसके बाद नुकीले कांटों वाली टहनियां तोड़कर लाते हैं, जिसके बाद उन टहनियों की भी पूजा होती है। यह कार्यक्रम होने पर ये लोग नंगे बदन इन कांटों पर लेट जाते हैं। उनका दावा है कि इस तरह वे सत्य और भक्ति की परीक्षा देते हैं।
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कांटों पर लेटने से पहले होती है पूजा
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रज्जड़ समाज के मुताबिक, इस मान्यता के पीछे एक कहानी है। इसमें बताया गया है कि एक बार पांडव पानी के लिए भटक रहे थे। बहुत देर बाद उन्हें नाहल समुदाय का एक व्यक्ति दिखाई दिया। पांडवों ने पानी का ठिकाना पूछा तो उसने पानी का स्रोत बताने से पहले पांडवों के सामने एक शर्त रख दी। नाहल समुदाय के उस शख्स ने कहा कि पानी का स्रोत बताने के बाद पांडवों को अपनी बहन की शादी नाहल से करानी होगी।