सपा मुखिया अखिलेश यादव का देश के प्रमुख वकील और कांग्रेस के असंतुष्ट नेता कपिल सिब्बल को समर्थन देकर राज्यसभा भेजने का फैसला देखने में जितना सामान्य है उतना है नहीं। घटनाक्रम पर नजर डालें और परिस्थितियों व समीकरणों का विश्लेषण करें तो इसकी वजह सिर्फ पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खां की नाराजगी दूर करने तक ही सीमित नहीं है। असल में बड़ी वजह 2024 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर राष्ट्रीय राजनीति में सपा के प्रभावी पैरोकार की जरूरत पूरी करने की नजर आ रही है। इसका संकेत अखिलेश एवं सिब्बल की बातों से मिला भी है।
Rajyasabha Election: कपिल सिब्बल के सहारे आखिर क्या है अखिलेश यादव का प्लान? 2024 पर नजर तो है ही लेकिन और...
आजम के अलावा भी हैं वजहें
अखिलेश ने सिब्बल को सपा के समर्थन से राज्यसभा भेजने का फैसला कर पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खां के तेवरों को भी ठंडा करने की कोशिश की है। पर, इसके अलावा भी कुछ कारण हैं। सिब्बल वह शख्स हैं जो राज्यसभा में तो मोदी सरकार को घेरते ही रहे हैं, उससे ज्यादा उनकी सक्रियता केंद्र सरकार के फैसलों के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में पैरवी में दिखी है। जाहिर है कि यूपी के सियासी समीकरणों एवं सपा की राजनीतिक जरूरतों के लिहाज से सिब्बल का यह अंदाज फिट बैठता हैं। इससे सपा न सिर्फ यूपी बल्कि देश के अन्य स्थानों पर भी सिब्बल के सहारे मुस्लिमों को संदेश देने की कोशिश तो कर ही सकती है। सफलता और असफलता अपनी जगह है। साफ है कि सपा जल्द 2024 के मद्देनजर राष्ट्रीय स्तर पर किसी नए मोर्चे का तानाबाना बुनने की कोशिश जरूर करेगी।
इनसे भी मिल रहा संकेत
अखिलेश और कपिल सिब्बल की बातों से बुधवार को संदेश मिल गया। सिब्बल ने कहा, ‘2024 को लेकर एक साथ आ रहे हैं । केंद्र की कमियों को उजागर करेंगे। मैं समझता हूं जब एक निर्दलीय कोई बात कहेगा तो लोगों को लगेगा कि ये किसी पार्टी से जुड़ा नहीं है । विपक्ष में रहकर हम एक गठबंधन बनाना चाहते हैं जो मोदी सरकार का विरोध करें। हम चाहते हैं कि 2024 में एक ऐसा माहौल बने कि सब लोग मिलकर मोदी सरकार की खामियां जनता तक पहुंचाएं। हम इसका प्रयास करेंगे ।’
उधर, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी कहा, ‘आज देश किस रास्ते पर है। महंगाई रुक नहीं रही। कानून-व्यवस्था ध्वस्त है। सीमाएं असुरक्षित हैं। चीन लगातार हमारी सीमाओं में अंदर आ रहा है। सिब्बल जी इन सब सवालों पर अपने और समाजवादी विचारों को राज्यसभा में रखेंगे।’ अखिलेश का प्रयास कितना सफल होगा या नहीं, यह तो आगे पता चलेगा।
दिख रहे राजनीतिक निहितार्थ
वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक रतनमणि लाल कहते हैं कि अखिलेश को पता है कि आबादी के लिहाज से देश के सबसे बड़े प्रदेश का मुख्यमंत्री रह चुकने के बावजूद भी उनका अभी ऐसा कद नहीं है जो दिल्ली में खुद को केंद्र में रखकर भाजपा के खिलाफ किसी मोर्चे का गठन कर सके। इसीलिए उन्होंने सिब्बल के सहारे अपनी भूमिका को महत्वपूर्ण बनाने की कोशिश की है। ताज्जुब नहीं कि लोकसभा चुनाव से पहले हाल ही में होने वाले राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति चुनाव के साथ राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा विरोधी मोर्चे की संभावनाओं पर काम शुरू होता दिखने लगे। यह अलग बात है कि मोदी और भाजपा विरोधी नेताओं की महत्वाकांक्षा इन्हें कितना आगे ले जाती है।