1857 के समर की पृष्ठभूमि...। मलिहाबादी आम के बगीचे, काकोरी की कोठियां, चौक की गलियां, बेतवा किनारे बना ऐतिहासिक शिव मंदिर, कलकल बहती गोमती, मूसाबाग, दिलकुशा का चर्च...। यहां के नजारे अस्सी के दशक में आई मशहूर अभिनेता शशि कपूर की फिल्म जुनून में देखने को मिले। इस फिल्म के जरिए लखनऊ का अक्स बॉलीवुड के रुपहले पर्दे पर नजर आया और यहां की रवायत से भी दर्शक रूबरू हुए। बॉलीवुड के हरदिल अजीज अभिनेताओं में शुमार शशि कपूर का अवध से गहरा नाता रहा है। (तस्वीर में योगेश प्रवीण बीच में)
कजरी सुनकर बोले शशि कपूर, यार... इसे थोड़ा सेक्सी बनाओ
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शशि कपूर बोले, कजरी को बनाओ सेक्सी
उन्होंने बताया कि एक बार क्लार्क अवध से शशि कपूर और मैं बाहर निकले। उन्हें ‘अंगना में भीजी, अटरिया में भीजी...’ कजरी सुनाई तो वे बोले इसे और सेक्सी बनाओ। जिस पर मैंने कहा कि फिल्म लखनऊ की है, इसलिए तहजीब और जमाने के हिसाब से काम करना होगा। लक्ष्मण रेखा का ध्यान रखना जरूरी है। इस पर शशि कपूर साहब खिलखिला पड़े। अक्सर उनसे ऐसे मुद्दों पर बातचीत हो जाती थी। उन्हें लखनऊ की धरोहरों से खासा लगाव है।
कोठी के मालिक ने की शशि कपूर की पैरवी
इतिहासकार ने बताया कि फिल्म की शूटिंग से विवाद जुड़े। मुकदमे तक हुए। दरअसल, मलिहाबाद में कवि कमाल की कोठी में शूटिंग होनी थी, जिसे रामरज (गेरुआ) से रंग दिया गया। यहां बने ग्रीनरूम में कलाकारों ने गणेश जी की फोटो लगाई और मुहूर्त के दौरान नारियल भी फोड़ा। जिस पर कोठी के मालिक ने यह कहते हुए मुकदमा कर दिया कि इससे उनकी धार्मिक आस्थाएं आहत हुई हैं। शशि कपूर की पूरी पैरवी हमने की। खैर, मुकदमा रफा-दफा हो गया।
जब घोड़े के ‘बूट’ चबा गए थे शशि कपूर
लखनऊ में ‘जुनून’ की शूटिंग के दौरान घोड़ों का इस्तेमाल किया जा रहा था। फिल्म के सेट पर ढेर सारा बूट (हरा चना यानी होरा) का अंबार लगा दिया जाता था। एक दिन शशि कपूर, दीप्ती नवल, शबाना आजमी, इस्मत चुगतई और मैं बेतवा नदी के किनारे बैठे-बैठे घोड़ों का बूट चबा गए। गुरूदत्त के भाई देवीदत्त प्रोड्यूसर थे, वे बोले घोड़ों का खाना कौन खा गया तो इस्मत चुगतई बोलीं-‘बम्बई में बूट को तरस गए थे। इसलिए चट कर गए।’, जिस पर हम सब मुस्कुरा दिए।
शूटिंग के लिए लोगों ने दिए पानदान व झूमर
चूंकि, शूटिंग लखनऊ में हो रही थी, इसलिए शूटिंग में इस्तेमाल होने वाली प्रॉपर्टीज लोकल लोगों ने ही मुहैया कराई थीं। खुद मेरी मां ने पानदान वगैरह दिया था। जबकि कुछ ने अपने घरों से झूमर, कांच की चीजें निकालकर दी थीं। एक दिलचस्प वाकया है। शूटिंग केलिए एक छोटे चर्च की जरूरत थी। अवध के गिरिजाघर बहुत आलीशान थे। लिहाजा मशक्कत के बाद दिलकुशा का चर्च खोजा गया। वहां के प्यारे मसीह ने अनुमति दी। जिस पर मीरा बेनेगल ने चर्च के मेंटेनेंस के लिए 20 हजार रुपये प्यारे मसीह को दिए।