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अपने काल्पनिक बच्चे के साथ जीती रही मानसिक रूप से बीमार मां, अद्भुत है ये कहानी

Tue, 12 Dec 2017 02:04 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Tue, 12 Dec 2017 02:04 AM IST
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repetva starts in Lucknow.

उत्सवी माहौल के बीच सोमवार को रंग-बिरंगी रोशनी से जगमग संगीत नाटक अकादमी के गोमती नगर स्थित परिसर में बहुप्रतीक्षित रेपेटवा का आगाज हुआ। बॉलीवुड सितारों ने जहां महोत्सव में चार चांद लगाए, वहीं उनकी प्रस्तुति ने पहले दिन को यादगार बनाया। नाटक, संगीत और हास्य से भरे कार्यक्रमों में चरित्र अभिनेता और पटकथा लेखक सौरभ शुक्ल, अभिनेता रजित कपूर, टीवी कलाकार और गायक नमित दास, टीवी कलाकार सादिया सिद्दीकी एवं सुनील पालवाल की उपस्थिति दर्शकों को आकर्षित करती रही।



‘मामू’ ने उठाया सत्य का सवाल
‘गोली मारो भेजे में’ के मामू और ‘पीके’, ‘जॉली एलएलबी-2’ में यादगार भूमिका करने वाले सौरभ शुक्ल रेपेटवा के रंगमंच पर नजर आए। समारोह का पहला नाटक ‘बर्फ’ उनका लिखा और निर्देशित किया था, जिसमें सवाल उठाया गया था कि अगर कोई अपने विश्वास में जीना चाहता है तो क्या दूसरों को उसके विश्वास को तोड़ने की कोशिश करनी चाहिए या उसे उसमें ही जीने देना चाहिए। नाटक बताता है कि यथार्थ से अधिक सत्य का निर्माण विश्वास में निहित है।

repetva starts in Lucknow.

नाटक कश्मीर के दंपती की कहानी है, जिसमें मानसिक रूप से बीमार मां एक काल्पनिक बच्चे के साथ जीवन यापन करती है। उसका पति उसके विश्वास को बनाए रखने की दुविधा में रखता है। इन दोनों के बीच एक डॉक्टर फंस जाता है। नाटक मनुष्य के मनोवैज्ञानिक दशा को बहुत खूबसूरती से उठाता है, जिसमें डॉक्टर भी अंतत: तर्क छोड़कर विश्वास का पक्ष लेने को बाध्य होता है। नाटक का महत्वपूर्ण पहलू इसकी कथा के साथ ही तीनों ही कलाकारों का प्रभावपूर्ण अभिनय है।

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मानसिक बीमार स्त्री की भूमिका में सादिया सिद्दीकी ने कमाल तो किया है उसके पति कश्मीरी चालक की भूमिका में सुनील पालवाल और चिकित्सक की भूमिका में सौरभ शुक्ल भी बेहतरीन रहे हैं, लेकिन नाटक में बार-बार यह भ्रम होता है कि इसमें कश्मीर की समस्या का उल्लेख भी होना है।

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खाली गांव, कश्मीरी पंडितों के पलायन, मुठभेड़ के जिक्र से हर समय दर्शकों पर यह दबाव बना रहता है कि इसमें कश्मीर की घटनाओं को भी जोड़ा जाना है, लेकिन लेखक-निर्देशक ने इस पृष्ठभूमि का इस्तेमाल मंच सज्जा और कथा विस्तार के लिए शायद किया हो। मूल कथा से इसका कोई सरोकार नहीं है।

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वरिष्ठ रंगकर्मी सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ का कहना है कि मुझे नाटक अच्छा लगा और इसे देखते हुए ‘शेर अफगान’ और इब्सन के ‘वाइल्ड डक’ की भी याद आती है। उन नाटकों में भी यह सवाल उठाए गए थे कि अगर किसी के सच न जानने से उसका जीवन बेहतर बना रह सकता है तो क्या उसे यथार्थ से परिचित कराना चाहिए? नाटक में अभिनय बहुत अच्छा था, लेकिन इतनी सजावटी मंच सज्जा न भी होती तो नाटक के उद्देश्य में कोई फर्क नहीं पड़ता।

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