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यहां हर घर मना मातम, हर गली से निकली अर्थी!
Wed, 14 Jan 2015 12:43 PM IST
सचिन त्रिपाठी/अमर उजाला, लखनऊ
सचिन त्रिपाठी/अमर उजाला, लखनऊ
Updated Wed, 14 Jan 2015 12:43 PM IST
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छिन गया अंधी मां का इकलौता सहाराः दतली की लल्लो देख नहीं सकतीं। दोनों आंखें नहीं हैं। तीन बेटों में बूढ़ी अंधी मां का सहारा सिर्फ सियाराम ही था। चार बिस्वा जमीन से दो जून की रोटी का जुगाड़ हो नहीं सकता था सो सियाराम रिक्शा चलाता। साठ बरस का हो गया फिर भी रिक्शा खींचता। आमदनी तो इतनी थी नहीं कि कोठरी के सामने एक साबुत छप्पर डाल पाता। मां-बेटे सिर्फ दो वक्त की रोटी के जुगाड़ पर ही खुश हो लेते। पर यह सब छिन गया।
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बेटे को सीए बनाना चाहता था, अब घर कौन चलाए? अटौरा में शिवराम के घर कोहराम मचा है। चर्चा चलते ही गांव वाले बताते हैं बड़ा जीवट था। दो बीघा की खेती ही थी। पर बच्चों को बड़ा बनाने का सपना नहीं छोड़ा। बेटा नरेंद्र लखनऊ में सीए की पढ़ाई कर रहा है। कहता था कि जल्दी दिन बहुर जाएंगे। पर शिवराम को वो खुशियां नसीब न हो सकी।
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मतईखेड़ा के रहने वाले विपिन द्विवेदी की मौत के बाद उसके परिवार में हर शख्स सदमे में है। पड़ोसियों के अनुसार विपिन कभी-कभार शराब पी लिया करते थे। रविवार रात को शराब पी तो दोबारा उठ ही नहीं पाया। तीन बीघे खेत के सहारे गुजर बसर करने वाले विपिन के परिवार में पत्नी रीता और दो छोटे-छोटे बच्चे हैं।
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खड़ता गांव के लल्लू की तीनों बेटियों को तो यह भी ज्ञान नहीं कि उनके सिर से बाप का साया उठ चुका है। सबसे बड़ी बेटी खुशबू छह साल की है। पायल चार तो आशिकी केवल दो साल की है। घर के नाम पर केवल एक छप्पर वाली कोठरी है।
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दतली के रहने वाले 40 वर्षीय लल्लू की मौत के बाद पूरा परिवार सदमे में है। जमीन के नाम पर परिवार के पास केवल चार आम के पेड़ हैं। इंदिरा आवास योजना से मिले पैसे से किसी तरह एक कमरा बन गया। पर आज तक उसमें दरवाजे लगने की नौबत नहीं आई। लल्लू की मौत के बाद परिवार के सामने रोटी का जुगाड़ करना सबसे बड़ी चुनौती है।
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