जेठ माह के बड़े मंगल पर लखनऊ में भंडारे की परंपरा दशकों पुरानी है। अलीगंज के नए-पुराने हनुमान मंदिर से इसका बहुत गहरा नाता है। कहते हैं नवाबी दौर में इन्हीं दोनों मंदिरों से बड़े मंगल पर मेला और भंडारे की प्रथा की शुरुआत हुई। जानकार बताते हैं कि गोमती के उस पार जो आजकल मडि़यांव के नाम से जाना जाता है, शीशम, नीम, पीपल, आम और पाकर के वृक्षों से खूब हरा-भरा था। बीच-बीच में छोटे-छोटे तालाब थे, जिनमें कमल खिला करते थे। इसी जगह पर बसाए गए चांदगंज में कई कच्चे तालाब मिले। इसी इलाके के पास ही अलीगंज आबाद हुआ, जिसे नवाब आसिफुद्दौला की मां, बहू और बेगम ने बसाया। यहीं पर रामभक्त हनुमान के दो प्राचीन मंदिर हैं। इस मंदिर के बारे में कुछ इतिहासकारों से बात करके हमने तैयार की खास रिपोर्ट...।
नवाबों ने शुरू की थी बड़े मंगल पर भंडारे की प्रथा, लखनऊ के इस मंदिर से है गहरा नाता
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इतिहासकार योगेश प्रवीन बताते हैं कि हजरत अली के नाम पर आबाद अलीगंज में बजरंग बली का प्रतिष्ठित होना शक्ति और शौर्य का समागम है। बताते हैं कि दो प्राचीन हनुमान मंदिर हैं, जिसे आजकल हम लोग मुख्य मंदिर मानते हैं वो इत्र कारोबारी लाला जाटमल ने सन 1783 में बनवाया था। इस मंदिर का विग्रह स्वयंभू है और ये मूर्ति महंत खासाराम को एक स्वप्न निर्देश में जमीन से प्राप्त हुई थी। मंदिर के निकट स्थित पुष्प करणी उस समय भी किसी प्राचीन पूजास्थल होने का संकेत देती थी। महंत खासराम के अनुरोध पर ही इस मंदिर का निर्माण कराया गया।
ऐसे बना मंदिर
मंदिर का मुख्य मंडप 6 मई, 1783 को बनकर तैयार हुआ था। लाला जाटमल को भी बजरंगबली की दिव्य प्रेरणा प्राप्त हुई और प्रसाद मिला। कहते हैं कि यहां किसी साधु को हनुमान जी ने साक्षात दर्शन दिए तभी से ये स्थान की गणना सिद्ध क्षेत्रों में होने लगी। मंदिर के पहले पुजारी सदानंद थे। धीरे-धीरे मंदिर की प्रतिष्ठा बढ़ती गई और दूर-दूर से लोग यहां आने लगे। पहले इस मंदिर के चारों ओर एक शानदार बाग था। मंदिर आज भी काफी विस्तृत घेरे में कई फाटकों से घिरा हुआ है, जिसके साथ पुरानी दुकानें बनी हैं।
अलीगंज मंदिर से शुरू हुआ बड़े मंगल का मेला
चंद्रमास जेठ के पहले मंगल का मेला अलीगंज मंदिर की प्रधान परंपरा है। जेठ के पहले मंगल को ही यहां हनुमान जी के प्रकट होने की बात कही जाती है। जेठ महीने के सभी मंगलवारों में यहां बड़ी भीड़ होती है। बड़े मंगल के मौके पर नवाब वाजिद अली शाह यहां एक ब्रह्मभोज का आयोजन करते थे और उनकी तरफ से बंदरों को चना खिलाया जाता था।
नवाब भी थे हनुमान भक्त
अवध के नवाबों में हनुमान जी पर बड़ी आस्था रही। नवाबी घराने की ओर से हनुमान जी की पूजा प्रतिष्ठा को संरक्षण प्राप्त था। बेगमों की उन पर आस्था थी। उसका प्रबल प्रतीक अलीगंज में स्थित हनुमान मंदिर दूसरा प्रधान मंदिर है, जिसे नवाब सआदत अली खां की मां जनाब आलिया ने बनवाया था। अवध सल्तनत के कौमी निशान के तौर पर इस मंदिर के शिखर पर दूज का चांद भी बना देखा जा सकता है। जनाब आलिया, रैकवार ठाकुर घराने की बेटी थीं और छत्र कुंवर उनका नाम था। उन्होंने ही अपने बेटे सआदत अली खां का नाम बचपन में मंगलू रखा था। इसलिए हनुमान मंदिर की निर्माण कथा पूरी तरह स्पष्ट होती है।