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वो मेरे चेहरे तक अपनी नफरतें लाया तो था, मैंने उसके हाथ चूमे और बेबस कर दिया...
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Updated Sat, 01 Dec 2018 04:02 PM IST
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मुशायरा
- फोटो : amar ujala
वो मेरे चेहरे तक अपनी नफरतें लाया तो था, मैंने उसके हाथ चूमे और बेबस कर दिया..., वो मेरी पीठ में खंजर जरूर उतारेगा, मगर निगाह मिलेगी तो कैसे मारेगा...। मशहूर शायर वसीम बरेलवी ने जब ये पंक्तियां पढ़ी तो महोत्सव का सांस्कृतिक पांडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। मौका था स्मृति उपवन में चल रहे लखनऊ महोत्सव में शुक्रवार को उर्दू अकादमी की ओर से आयोजित ऑल इंडिया मुशायरे का, जिसमें नामचीन शायरों ने अपनी रचनाओं से शाम को यादगार बनाया।
मुशायरा
- फोटो : amar ujala
वसीम बरेलवी ने कहा कि 57 साल का सफर है मुशायरे की जिंदगी का। लखनऊ के जिस अदब के कायल रहे हैं, वह आज देखने को मिला है। उन्होंने कहा, कल एक गांव की बुढ़िया मेरी कार से जब टकराई, बोली तोहरा दोष नहीं है, हमीं को दिखत नाहीं। तहजीबी दर्द सुनाते हुए कहा, इतना बिखराव संभाला नहीं जाता मुझसे, खुद को यू ट्यूब पर डाला नहीं जाता मुझसे..., पांव जख्मों के हुए जाते हैं ऐसे आदी, अब तो कांटा भी नहीं निकाला जाता मुझसे...। इसी क्रम में उन्होंने गजल, जिन्हें आपस में टकराने से ही फुर्सत नहीं मिलती, उन्हीं शाखों के पत्ते लहलहाना भूल जाते हैं। दरिया का सारा नशा उतरता चला गया, मुझको डुबोया और मैं उभरता चला गया, वो पैरवी तो झूठ की करता चला गया, लेकिन उसका चेहरा उतरता चला गया...।
मुशायरा
- फोटो : amar ujala
मंजर भोपाली ने सुनाया, करम पर मुझ पे बहुत सरफिरी हवा का है, हवा से कह दो कि ये पेड़ मुस्तफा का है, ये आंधियों के बुझाने से बुझ नहीं सकता, ये जो चराग है रोशन मेरी अना का है...। किसी यजीद के आगे मैं झुक नहीं सकता, मेरे मिजाज पर एहसान करबला का है। वो कहीं तो मिले वो कभी तो मिले, ख्वाब में ही सही जिंदगी तो मिले। जिंदगी काट देंगे गली में तेरी, जानेमन हमको तेरी गली तो मिले। मुझको रावण ही रावण मिले हैं मगर, जिंदगी में कोई राम भी तो मिले... गाकर सुनाया। मुशायरे का आगाज डॉ. मखमूर काकोरवी ने किया।
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मुशायरा
- फोटो : amar ujala
उन्होंने समाज उनको हिकारत की नजर से देखता क्यों है, गरीबी में भी जो दो-चार बच्चों को पाल कर खुश हैं, मगर समाज ऐसे अमीरों को कुछ क्यों नहीं कहता जो घरों में कुत्ते पाल के खुश रहते हैं...। आगे सुनाया ये नफरतों की हवाएं यूं ही जो चलती रहीं, कभी बुझेंगे किसी के कभी किसी के चराग...। डॉ. तारिक कमर ने फरमाया, तुम जो कहते हो बाकी न रहे अहले दिल, जख्म बेचोगे चलो खरीदार हैं हम...। शायर ने ये अलग बात कि वो मेरा खरीदार नहीं, आके बाजार की रौनक तो बढ़ा दी उसने... भी सुनाया। मुशायरे की सदारत वसीम बरेलवी व निजामत अब्बार रजा नैयर ने की। इस मौके पर राज्यमंत्री मोहसिन रजा उपस्थित रहे।
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मुशायरा
- फोटो : amar ujala
...मेरे चिराग हमेशा हवा के साथ रहे
संजय मिश्र शौक ने सुनाया, बिछड़ी है पिया से वो अभागन जैसे, सिंदूर से लगती है सुहागन जैसी, विरहा में तड़पती है तो लगती है जैसे बलखाती है जमीं पर कोई नागिन जैसे...। जिनको अपनी गोद में पाला वही बच्चे मेरे, पांव हैं अपने मेरी दस्तार पर रखे हुए... और मुझसे पत्थर में मुहब्बत को शगूफे खिल जाएं, देखना है तो मुझे गौर से इतना देखो... सुनाकर वाहवाही लूटी। वासिफ फारुखी ने पढ़ा, तमाम उम्र किसी बेवफा के साथ रहे, मेरे चिराग हमेशा हवा के साथ रहे और सबक यही तो है किश्ती के डूब जाने का, खुदा को भूल के हम नाखुदा के साथ रहे...। सियासत का हुनर इस तरह सरकारें बदलता है कि जैसे कोई कातिल अपनी तलवारें बदलता है, भरोसा जिसको अपने दस्तोबाजू पर नहीं होता, वही मल्लाह कश्ती और पतवारे बदलता है। जो दो वक्त की रोटी के बदले जिस्म बिकते हैं, उसी होटल का मालिक हर बरस कारें बदलता है... सुनाया। अब्बास रजा नैयर ने सुनाया, मैं दीया हूं मुझे बुझाएगी, ऐ हवा सांस फूल जाएगी...।
संजय मिश्र शौक ने सुनाया, बिछड़ी है पिया से वो अभागन जैसे, सिंदूर से लगती है सुहागन जैसी, विरहा में तड़पती है तो लगती है जैसे बलखाती है जमीं पर कोई नागिन जैसे...। जिनको अपनी गोद में पाला वही बच्चे मेरे, पांव हैं अपने मेरी दस्तार पर रखे हुए... और मुझसे पत्थर में मुहब्बत को शगूफे खिल जाएं, देखना है तो मुझे गौर से इतना देखो... सुनाकर वाहवाही लूटी। वासिफ फारुखी ने पढ़ा, तमाम उम्र किसी बेवफा के साथ रहे, मेरे चिराग हमेशा हवा के साथ रहे और सबक यही तो है किश्ती के डूब जाने का, खुदा को भूल के हम नाखुदा के साथ रहे...। सियासत का हुनर इस तरह सरकारें बदलता है कि जैसे कोई कातिल अपनी तलवारें बदलता है, भरोसा जिसको अपने दस्तोबाजू पर नहीं होता, वही मल्लाह कश्ती और पतवारे बदलता है। जो दो वक्त की रोटी के बदले जिस्म बिकते हैं, उसी होटल का मालिक हर बरस कारें बदलता है... सुनाया। अब्बास रजा नैयर ने सुनाया, मैं दीया हूं मुझे बुझाएगी, ऐ हवा सांस फूल जाएगी...।