गुजरात के नतीजों के यूपी के लिए गहरे संकेत हैं। भले ही गुजरात में भाजपा ने 22 साल से चली आ रही सत्ता बरकरार रखी हो, लेकिन नतीजों में दोनों राष्ट्रीय दलों के लिए कई नसीहतें, हिदायतें, सबक और संदेश छिपे हैं। गुजरात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का गृहराज्य है, जो आज अपनी पहचान अपराजेय के तौर पर स्थापित कर चुके हैं।
गुजरात चुनाव के नतीजे यूपी के लिए हैं संदेश, ये है मोदी-राहुल की अगली चुनौती
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यह है वजह
इसकी वजह है। एक तो गुजरात से उत्साहित राहुल निश्चित रूप से उत्तर प्रदेश में ज्यादा ताकत से जुटेंगे। उनकी नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाना भी भाजपा के लिए अब उतना आसान नहीं होगा । कारण, गुजरात में भाजपा को कड़ी टक्कर देकर राहुल ने यह तो बता ही दिया है कि उन्होंने अतीत से बहुत कुछ सीखा है। जिस तरह उन्होंने नरेंद्र मोदी पर टिप्पणी करने पर मणिशंकर अय्यर पर कार्रवाई की।
भाजपा के हिंदुत्व के एजेंडे के जवाब में पहले के विपरीत इस बार उन्होंने धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुस्लिम हितैषी छवि गढ़ने से परहेज किया। उससे भी यह साफ हो गया कि उन्हें अब कोई ऐसा सलाहकार जरूर मिल गया है जिसने उन्हें हिंदुत्व का ध्रुवीकरण न होने देने का मंत्र दे दिया है। एक बात और राहुल को बैसाखियों के बजाय खुद के भरोसे चलना होगा। उन्हें भाजपा का मजबूत विकल्प पेश करना होगा।
कांग्रेस व भाजपा दोनों को संदेश
ऐसे में भाजपा को संदेश है कि उत्तर प्रदेश में 2019 के लिए 2014 से इतर रणनीति बनानी होगी। साथ ही केंद्र सरकार की योजनाओं का लोगों तक जमीनी लाभ पहुंचने की ईमानदारी और निर्ममता से समीक्षा कर स्थिति ठीक करनी होगी। यही नहीं, प्रदेश सरकार को भी हकीकत में ज्यादा जमीनी सरोकार बनाना होगा। कांग्रेस के लिए संदेश यह भी है कि वह उत्तर प्रदेश के संगठन में फेरबदल करके संघर्ष करने वाले और मेहनती कार्यकर्ताओं को आगे लाए और बागडोर दे।
राहुल को ऊर्जा, शाह को संदेश
भले ही भाजपा ने गुजरात में सत्ता में वापसी कर ली हो। पर, उसकी सीटें घटी हैं। वर्ष 2012 में भाजपा को 115 सीटें मिली थीं। हालांकि बाद में हुए उपचुनाव में चार सीटें भाजपा को और मिल गई थीं। अभी दो महीने पहले राज्यसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने कांग्रेस के कुछ विधायकों को तोड़कर यह संख्या और बढ़ा ली थी। पर, इस बार सीटें कम हुई हैं । हालांकि वर्ष 2012 की तुलना में उसका मत प्रतिशत कुछ बढ़ा है लेकिन तुलनात्मक रूप से कांग्रेस पराजित होने के बावजूद अधिक लाभ में दिख रही है। यहां यह उल्लेखनीय है कि लोकसभा के चुनाव में किसी भी राष्ट्रीय दल के लिए उत्तर प्रदेश का प्रदर्शन खास मायने रखता है।
कहा जाता है कि जिसे यूपी ने जिता दिया, उसने दिल्ली जीत ली। भाजपा की बात करें तो मोदी और शाह के लिए यह संदेश है कि वह गुजरात में सत्ता में वापसी पर खुश भले हो लें लेकिन उन्हें अगर 2019 में 2014 दोहराना है तो उन्हें उत्तर प्रदेश को लेकर नए सिरे से तैयारी करनी होगी। इस बार उनके पास यूपी में गुजरात के विकास का सपना दिखाकर पहले जैसा समर्थन पाना आसान नहीं होगा। ऐसे में गुजरात के नतीजों से मिली ऊर्जा के सहारे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अब मिशन 2019 के लिए उत्तर प्रदेश में अधिक उत्साह से जुटेंगे।