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तीन तलाक मुद्दे पर क्या चाहती हैं लखनऊ की ये तरक्की पसंद महिलाएं, पढ़ें
ब्यूरो/अमरउजाला, लखनऊ
Updated Sun, 16 Oct 2016 02:42 AM IST
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तीन तलाक मुद्दा
- फोटो : amar ujala
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तीन तलाक और समान नागरिक संहिता पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सख्त ऐतराज जताया है। केंद्र सरकार और बोर्ड के रुख पर बहसें चल रही हैं। इन सबके बीच विद्वान और तरक्की पसंद महिलाओं की दलील है कि औरतों के हित के सवाल को सियासी पेंचीदगियों में नहीं उलझाया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि कुरआन में एक साथ तीन तलाक कहने की व्यवस्था नहीं है और इसका दुरुपयोग रोका जाना चाहिए। उनका कहना है कि औरतों के अधिकार के इस सवाल पर बेहद संजीदगी के साथ आगे बढ़ा जाना चाहिए। इसे और जटिल बनाने और उलझाने के बजाय औरतों को उसका वाजिब अधिकार मिलना चाहिए। इस मसले पर तरक्कीपसंद महिलाएं क्या चाहती हैं, उनकी क्या राय है, पेश है रिपोर्ट....
डॉ. समन हबीब, वैज्ञानिक, सीडीआरआई
- फोटो : amar ujala
धीरे-धीरे बढ़ें समान नागरिक संहिता की ओर
कई मुस्लिम देशों में भी मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड है लेकिन वहां एक बार में तीन तलाक मान्य नहीं है। असल में इसे गलत तरीके से परिभाषित किया जाता है। एक बार तलाक बोलने के बाद दूसरी बार में तीन माह का अंतराल होना चाहिए। यह इसलिए कि इस दौरान शायद पति-पत्नी के बीच गलतफहमी दूर हो सके और वे साथ रहना चाहें। दूसरा उनके दोस्त-रिश्तेदार सुलह करा सकें। धीरे-धीरे हमें समान नागरिक संहिता की ओर बढ़ना चाहिए। असल में यह मुद्दा सिर्फ एक समुदाय का नहीं, सभी समुदाय में ऐसे बदलाव होने चाहिए जिससे हमारे संविधान में औरतों को जो अधिकार दिए गए हैं, उन्हें सुनिश्चित किया जा सके ।
डॉ. समन हबीब, वैज्ञानिक, सीडीआरआई
कई मुस्लिम देशों में भी मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड है लेकिन वहां एक बार में तीन तलाक मान्य नहीं है। असल में इसे गलत तरीके से परिभाषित किया जाता है। एक बार तलाक बोलने के बाद दूसरी बार में तीन माह का अंतराल होना चाहिए। यह इसलिए कि इस दौरान शायद पति-पत्नी के बीच गलतफहमी दूर हो सके और वे साथ रहना चाहें। दूसरा उनके दोस्त-रिश्तेदार सुलह करा सकें। धीरे-धीरे हमें समान नागरिक संहिता की ओर बढ़ना चाहिए। असल में यह मुद्दा सिर्फ एक समुदाय का नहीं, सभी समुदाय में ऐसे बदलाव होने चाहिए जिससे हमारे संविधान में औरतों को जो अधिकार दिए गए हैं, उन्हें सुनिश्चित किया जा सके ।
डॉ. समन हबीब, वैज्ञानिक, सीडीआरआई
डॉ. साबरा हबीब, प्रोफेसर एमेरेट्स, लखनऊ विश्वविद्यालय
- फोटो : amar ujala
कुरआन से हटकर काम करेंगे तो आवाजें उठेंगी
समान नागरिक संहिता पर अभी अध्ययन की जरूरत है, इसे एकदम से लागू नहीं करना चाहिए। तीन तलाक को बिना वजह मुद्दा बनाया गया। कुरआन में कहीं एक साथ तीन तलाक की बात नहीं। असल में जब किसी चीज या व्यवस्था का दुरुपयोग होता है तो दिक्कतें आती ही हैं। यदि कुरआन में दी व्यवस्था के तहत तलाक बोलने को ही जारी रखा जाए तो इस तरह के विवाद नहीं होंगे, कोई पीड़ित नहीं होगा। कुरआन से हटकर काम करेंगे तो ऐसी आवाजें उठेंगी ही।
- डॉ. साबरा हबीब, प्रोफेसर एमेरेट्स, लखनऊ विश्वविद्यालय
समान नागरिक संहिता पर अभी अध्ययन की जरूरत है, इसे एकदम से लागू नहीं करना चाहिए। तीन तलाक को बिना वजह मुद्दा बनाया गया। कुरआन में कहीं एक साथ तीन तलाक की बात नहीं। असल में जब किसी चीज या व्यवस्था का दुरुपयोग होता है तो दिक्कतें आती ही हैं। यदि कुरआन में दी व्यवस्था के तहत तलाक बोलने को ही जारी रखा जाए तो इस तरह के विवाद नहीं होंगे, कोई पीड़ित नहीं होगा। कुरआन से हटकर काम करेंगे तो ऐसी आवाजें उठेंगी ही।
- डॉ. साबरा हबीब, प्रोफेसर एमेरेट्स, लखनऊ विश्वविद्यालय
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परवीन तल्हा, पद्मश्री
- फोटो : amar ujala
औरतों को परेशान करने के लिए नहीं है तलाक
पहली बात तो यह कि इस्लाम खुद तलाक की निंदा करता है। असल में इस्लाम बहुत ही लिबरल है। लगभग 1500 साल पहले जब इस्लाम में तलाक शब्द आया तब यह किसी मजहब में नहीं था। यह व्यवस्था औरतों को परेशान करने के लिए नहीं आई थी। बल्कि यह सोचकर शामिल किया गया कि पति-पत्नी के रिश्ते में दिक्कतें आएं तो एक विकल्प होना चाहिए। लेकिन तलाक बहुत ही खराब स्थिति का विकल्प है। जहां तक बात समान नागरिक संहिता की है तो इसे देखा जा सकता है, कोई हर्ज नहीं। लेकिन यह सुनिश्चित करना होगा कि वह किसी को परेशान करने की नीयत से न हो।
- परवीन तल्हा, पद्मश्री
पहली बात तो यह कि इस्लाम खुद तलाक की निंदा करता है। असल में इस्लाम बहुत ही लिबरल है। लगभग 1500 साल पहले जब इस्लाम में तलाक शब्द आया तब यह किसी मजहब में नहीं था। यह व्यवस्था औरतों को परेशान करने के लिए नहीं आई थी। बल्कि यह सोचकर शामिल किया गया कि पति-पत्नी के रिश्ते में दिक्कतें आएं तो एक विकल्प होना चाहिए। लेकिन तलाक बहुत ही खराब स्थिति का विकल्प है। जहां तक बात समान नागरिक संहिता की है तो इसे देखा जा सकता है, कोई हर्ज नहीं। लेकिन यह सुनिश्चित करना होगा कि वह किसी को परेशान करने की नीयत से न हो।
- परवीन तल्हा, पद्मश्री
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शीरीन अब्बास, शिक्षिका, रामस्वरूप यूनिवर्सिटी
- फोटो : amar ujala
महिला अधिकारों से जुड़ा कोड सब पर लागू
मां-बाप के बाद सबसे करीबी रिश्ता पति-पत्नी का होता है। एक महिला के तौर पर कहूं तो सिर्फ तीन बार बोल देने से रिश्ता खत्म नहीं होता। कई इस्लामिक देशों में ऐसे तलाक की व्यवस्था नहीं। समय के साथ हमें धर्म को प्रोग्रेसिव बनाना चाहिए। मौलवी खुद कहते हैं कि तलाक खुदा की नजरों में सबसे नागवार चीज है। जहां तक बात समान नागरिक संहिता की है तो मैं भारत की नागरिक हूं और संविधान के साथ हूं। महिलाओं के अधिकारों से जुड़ा जो भी कोड है, वह सभी में समान तौर से लागू होना चाहिए। सबसे जरूरी है महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा।
- शीरीन अब्बास, शिक्षिका, रामस्वरूप यूनिवर्सिटी
मां-बाप के बाद सबसे करीबी रिश्ता पति-पत्नी का होता है। एक महिला के तौर पर कहूं तो सिर्फ तीन बार बोल देने से रिश्ता खत्म नहीं होता। कई इस्लामिक देशों में ऐसे तलाक की व्यवस्था नहीं। समय के साथ हमें धर्म को प्रोग्रेसिव बनाना चाहिए। मौलवी खुद कहते हैं कि तलाक खुदा की नजरों में सबसे नागवार चीज है। जहां तक बात समान नागरिक संहिता की है तो मैं भारत की नागरिक हूं और संविधान के साथ हूं। महिलाओं के अधिकारों से जुड़ा जो भी कोड है, वह सभी में समान तौर से लागू होना चाहिए। सबसे जरूरी है महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा।
- शीरीन अब्बास, शिक्षिका, रामस्वरूप यूनिवर्सिटी