सुलखान सिंह रविवार को डीजीपी के पद से रिटायर हो गए। इससे ठीक पहले उन्होंने ‘अमर उजाला’ से खास बातचीत में कहा कि पुलिस कर्मियों की वेतन विसंगति दूर न कर पाना और उन्हें प्रमोशन न दे पाने का मलाल रहा। उन्होंने अपने मातहतों की जमकर तारीफ की और कहा कि यूपी की पुलिस किसी भी प्रदेश या देश की पुलिस से बेहतर है।
रिटायर होने से पहले डीजीपी सुलखान सिंह को याद आई ये गजल, बताया- इस बात का रहा मलाल
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सुलखान सिंह ने कहा, मेरी कोशिश थी कि सिपाहियों और दरोगा की भर्ती प्रक्रिया मेरे कार्यकाल में शुरू हो लेकिन यह संभव नहीं हो पाया। उम्मीद है कि जल्द ही यह प्रक्रिया शुरू होगी। दरअसल भर्ती हो या प्रमोशन, सारे काम नए सिरे से करने थे। इसके लिए पहले नियमावली में बदलाव कराना था और फिर रिक्ति के मुकाबले पदों की भर्ती के लिए प्रस्ताव तैयार कर भर्ती बोर्ड को भेजना था। यह सब काम इतना आसान नहीं था। फिर भी पांच हजार दरोगा की भर्ती करने का प्रस्ताव भर्ती बोर्ड को भेजा जा चुका है। 42 हजार सिपाहियों की भर्ती का प्रस्ताव बहुत जल्द भेजा जाएगा।
आठ हजार हेड कांस्टेबल दरोगा के पद पर व 2300 दरोगा को इंस्पेक्टर के पद पर प्रमोशन देने के लिए भी काम तेजी से किया गया, लेकिन अफसोस कि डीजीपी रहते हुए इसका लाभ इन पुलिस कर्मियों तक नहीं पहुंचा सका। उम्मीद है, एक-डेढ़ माह में इसका लाभ इन पुलिस कर्मियों को जरूर होगा।
बदमाशों को उन्हीं की भाषा में समझाने की पुलिस को दी छूट
अपने कार्यकाल के दौरान सुलखान सिंह ने बदमाशों को उन्हीं की भाषा में समझाने की पुलिस को छूट दी। इसका नतीजा रहा कि आठ माह के कार्यकाल के दौरान पुलिस ने 28 बदमाशों को मौत के घाट उतार दिया। हालांकि सुलखान सिंह का कहना है कि पुलिस की मंशा अपराधियों को जान से मारने की नहीं रही। पुलिस ने कोशिश की कि वे जिंदा बच जाएं लेकिन मुठभेड़ ऐसी थी कि उनकी जान नहीं बच पाई। डीजीपी ने कहा कि मुठभेड़ के दौरान 196 बदमाश और 205 पुलिस कर्मी घायल हुए। उन्होंने कहा कि बदमाशों में मोर्चा लेने में हमेशा रिस्क रहता है। हमें खुशी है कि पुलिस ने रिस्क उठाया और अपराधियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की।
‘...नए पत्तों के आने में अभी कुछ दिन लगेंगे’
38 साल के पुलिस करिअर वाले सुलखान को अपना नया रूटीन सेट करने में अभी समय लगेगा। शायद यही वजह थी कि रिटायरमेंट से कुछ घंटे पहले उन्होंने जावेद अख्तर की एक गजल अपने लैपटॉप पर लगा दी :
‘जरा मौसम तो बदला है मगर पेड़ों की शाखों पर
नए पत्तों के आने में अभी कुछ दिन लगेंगे,
बहुत से जर्द चेहरों पर गुबारे गम है बेशक,
पर उनको मुस्कुराने में अभी कुछ दिन लगेंगे।’
35 रुपये मिला था पहला वेतन
अपनी यादें साझा करते हुए सुलखान ने बताया कि उनकी पहली नियुक्ति गुवाहाटी में रेलवे में सिविल इंजीनियर के पद पर 31 दिसंबर को हुई थी। एक दिन का वेतन उन्हें 34.95 रुपये मिला था। लगभग साल भर के बाद वह आईपीएस अफसर बन गए। इस दौरान उनकी बेसिक सैलरी 700 रुपये हुआ करती थी। मौजूदा चीफ सेक्रेटरी के साथ वह अलीगढ़ में शुरुआती दिनों में तैनात रहे। तब सिनेमाघरों में 15-15 मिनट बैठकर वहां की गतिविधियों पर नजर रखते थे।