यह साल उस क्षण का गवाह बन ही गया, जिसका इंतजार रामभक्त 492 वर्ष से कर रहे थे। अयोध्या में जिस श्रीराम जन्मभूमि मंदिर को मुगल शासक बाबर की शह पर वर्ष 1528 में तोड़ दिया गया था, पीएम नरेंद्र मोदी ने 5 अगस्त को उसी मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन किया।
Year Ender 2020: अयोध्या के इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा ये साल, इन तस्वीरों में कैद हो गए ऐतिहासिक पल
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कोरोना व लॉकडाउन जैसी चुनौतियों के बीच प्रदेश सरकार के सांस्कृतिक व धार्मिक पर्यटन के सहारे हिंदुत्व के एजेंडे को और परवान चढ़ाने का काम पहले की तरह इस साल भी जारी रहा। अयोध्या में दीपोत्सव का एक और रिकॉर्ड बनाने के बीच पर्यटन के साथ रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए भी यह साल स्मरण रहेगा तो काशी की विश्वविख्यात देव दीपावली में प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी की भागीदारी के लिए भी।
यह साल इस कसक के लिए भी याद रखा जाएगा कि जन्मभूमि स्थल पर सफाई के काम, रामलला के विग्रह को मौजूदा गर्भगृह से दूसरे स्थान पर निर्मित अस्थायी मंदिर में लाने के ऐतिहासिक अनुष्ठान के बावजूद मंदिर निर्माण की विधिवत शुरुआत नहीं हो पाई। तमाम कोशिशों, भूमि मिलने तथा नक्शा बनने के बावजूद 2020 नई निर्मित होने वाली मस्जिद की शुरुआत भी नहीं हो सकी।
अयोध्या बैठक से मंदिर को आकार: कोरोना के कहर के बीच अयोध्या में मंदिर की शुरुआत की कई चर्चाएं चलीं। चर्चा सार्वजनिक हुई कि प्रधानमंत्री मोदी 30 अप्रैल को वर्चुअल श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण की शुरुआत कर देंगे। पर, मंदिर आंदोलन की सूत्रधार विहिप ने साफ किया कि पीएम को औपचारिक निमंत्रण दिया जाएगा। उसके बाद उनकी तरफ से निश्चित तारीख पर उनके हाथों मंदिर निर्माण की विधि विधान से शुरुआत होगी।
ट्रस्ट की अयोध्या में 18 जुलाई की बैठक में मंदिर निर्माण की योजना को आकार देने का काम हुआ। प्रधानमंत्री को निमंत्रण दिया गया और पीएमओ से 5 अगस्त का मुहूर्त मंदिर निर्माण की शुरुआत के लिए निश्चित हुआ। दिव्यता के साथ भव्यता देने के लिए मंदिर के आकार-प्रकार में बदलाव भी किया गया, जिसके अनुसार मंदिर की ऊंचाई 128 से बढ़ाकर 161 फीट और इसे दो से बढ़ाकर तीन मंजिला कर दिया गया।
फैसलों का फलादेश: वर्ष 2019 जहां मंदिर-मस्जिद विवाद को लेकर तमाम शंकाओं के साथ शुरू हुआ थी, वहीं 2020 की शुरुआत इस मुद्दे पर बीते वर्ष के अंत में आए सबसे बड़ी अदालत के फैसले का फलादेश समझने के साथ हुई।
- तमाम अटकलों के बाद 5 फरवरी उस समय इतिहास में दर्ज हो गई जब मंदिर-मस्जिद जैसे संवेदनशील विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण फैसलों को जमीन पर उतारने के क्रम में प्रधानमंत्री मोदी ने संसद में केंद्रीय मंत्रिमंडल के फैसले का हवाला देते हुए मंदिर निर्माण के लिए श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की घोषणा की।
- साथ ही ट्रस्ट को 90 के दशक में तत्कालीन केंद्र सरकार द्वारा अधिगृहीत अयोध्या की 67 एकड़ और मुकदमे वाली 2.77 एकड़ भूमि ट्रस्ट को सौंपते हुए हिंदुत्व के एजेंडे पर टस से मस न होने का संकेत दे दिया।
- प्रदेश की योगी सरकार ने भी सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश को अमली जामा पहनाते हुए अयोध्या के सोहावल के पास धन्नीपुर गांव में मस्जिद निर्माण के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड को 5 एकड़ जमीन सौंपकर अपना दायित्व पूरा किया।
- खास बात यह भी रही कि सुन्नी वक्फ बोर्ड ने इस जमीन पर बनने वाली मस्जिद का नाम बाबरी के नाम पर न रखने की घोषणा कर भावी पीढ़ी को इस विवाद से दूर रखने की पहल की। हालांकि इस मस्जिद को लेकर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और सुन्नी वक्फ बोर्ड के बीच मतभेदों का समाधान साल के अंत तक नहीं हो पाया।