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गेस्ट हाउस कांड ने मायावती और मुलायम को बना दिया था दुश्मन, पर्दे के पीछे ये थी कहानी
Sat, 12 Jan 2019 05:37 PM IST
शाहरुख खान
बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी
Published by: शाहरुख खान
Updated Sat, 12 Jan 2019 05:37 PM IST
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मायावती और मुलायम सिंह
- फोटो : अमर उजाला
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उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में शनिवार को बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी ने गठबंधन का एलान किया। बसपा सुप्रीमो मायावती और सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि ये गठबंधन सिर्फ 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए नहीं है, बल्कि ये लंबा चलेगा और स्थाई है। दोनों दलों ने कहा कि वे लोकसभा में यूपी की 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी। रायबरेली और अमेठी सीट कांग्रेस के लिए छोड़ी गई है और बाकी दो सीटें सहयोगी पार्टियों के लिए।
अखिलेश यादव और मायावती
- फोटो : अमर उजाला
प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए मायावती गेस्ट हाउस कांड का जिक्र करना नहीं भूलीं और उन्होंने कहा कि देशहित और जनहित में उन्होंने इस गठबंधन को उस कांड पर तरजीह दी है। मायावती ने कहा, 1993 विधानसभा चुनावों में भी दोनों दलों के बीच गठबंधन हुआ था और तब सपा-बसपा ने हवाओं का रुख बदलते हुए सरकार बनाई थी। हालांकि ये गठबंधन कुछ गंभीर कारणों से लंबे समय तक नहीं चल सका था। देशहित और जनहित को 1995 के लखनऊ गेस्ट कांड के ऊपर रखते हुए राजनीतिक तालमेल का फैसला किया है।
इस कड़वाहट की क्या वजह थी?
लेकिन लखनऊ के गेस्ट हाउस में ऐसा क्या हुआ था जिससे दोनों पार्टियों की दोस्ती अचानक दुश्मनी में बदल गई। इसे समझने के लिए करीब 25 बरस पहले झांकना होगा। उत्तर प्रदेश की राजनीति में साल 1995 और गेस्ट हाउस कांड, दोनों बेहद अहम हैं। उस दिन ऐसा कुछ हुआ था जिसने न केवल भारतीय राजनीति का बदरंग चेहरा दिखाया बल्कि मायावती और मुलायम के बीच वो खाई बनाई जिसे लंबा अरसा भी नहीं भर सका। दरअसल, साल 1992 में मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी बनाई और इसके अगले साल भाजपा का रास्ता रोकने के लिए रणनीतिक साझेदारी के तहत बहुजन समाज पार्टी से हाथ मिलाया।
लेकिन लखनऊ के गेस्ट हाउस में ऐसा क्या हुआ था जिससे दोनों पार्टियों की दोस्ती अचानक दुश्मनी में बदल गई। इसे समझने के लिए करीब 25 बरस पहले झांकना होगा। उत्तर प्रदेश की राजनीति में साल 1995 और गेस्ट हाउस कांड, दोनों बेहद अहम हैं। उस दिन ऐसा कुछ हुआ था जिसने न केवल भारतीय राजनीति का बदरंग चेहरा दिखाया बल्कि मायावती और मुलायम के बीच वो खाई बनाई जिसे लंबा अरसा भी नहीं भर सका। दरअसल, साल 1992 में मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी बनाई और इसके अगले साल भाजपा का रास्ता रोकने के लिए रणनीतिक साझेदारी के तहत बहुजन समाज पार्टी से हाथ मिलाया।
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मुलायम और कांशीराम
- फोटो : amar ujala
सपा और बसपा ने 256 और 164 सीटों पर मिलकर चुनाव लड़ा। सपा अपने खाते में से 109 सीटें जीतने में कामयाब रही जबकि 67 सीटों पर हाथी का दांव चला। लेकिन दोनों की ये रिश्तेदारी ज्यादा दिन नहीं चली। साल 1995 की गर्मियां दोनों दलों के रिश्ते खत्म करने का वक्त लाईं। इसमें मुख्य किरदार गेस्ट हाउस है। इस दिन जो घटा उसकी वजह से बसपा ने सरकार से हाथ खींच लिए और वो अल्पमत में आ गई।
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भाजपा, मायावती के लिए सहारा बनकर आई और कुछ ही दिनों में तत्कालीन राज्यपाल मोतीलाल वोहरा को वो चिट्ठी सौंप दी गई कि अगर बसपा सरकार बनाने का दावा पेश करती है तो भाजपा का साथ है। वरिष्ठ पत्रकार और उस रोज इस गेस्ट हाउस के बाहर मौजूद रहे शरत प्रधान ने बीबीसी को बताया कि वो दौर था जब मुलायम यादव की सरकार थी और बसपा ने समर्थन किया था, लेकिन वो सरकार में शामिल नहीं हुई थी। साल भर ये गठबंधन चला और बाद में मायावती की भाजपा के साथ तालमेल की खबरें आईं जिसका खुलासा आगे चलकर हुआ। कुछ ही वक्त बाद मायावती ने अपना फैसला सपा को सुना दिया।