समाज में नफरत कम करने के मकसद से गुरुवार को दलित और मुसलमान एक साथ बैठे। जज्बात साझा किया और एक थाल में भोजन कर एकता व भाईचारे का संदेश दिया।
दोनों समुदाय ने समाज से इस पैगाम को दूर तक ले जाने की उम्मीद जताई। उलेमा ने भी साफ किया कि दिलों को जोड़ने की यह मुहिम सियासी नहीं है।
कैसरबाग स्थित बारादरी में जमीयत उलेमा उप्र और नेशनल कन्फेडरेशन ऑफ दलित आदिवासी के संयुक्त आयोजन में दलित और मुस्लिम समाज केलोग साझा भोज के लिए एकत्र हुए थे। दलित मुस्लिम एकता के इस कार्यक्रम को मिशन का रूप देने पर सहमति बनी।
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दलित-मुस्लिम भोज
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मौलाना महमूद असद मदनी ने इस कार्यक्रम को पूरी तरह सामाजिक बताया। उन्होंने कहा, हम दिलों को जोड़ने की बात करने आए हैं जबकि राजनीति इंसानों को बांटने का नाम है। हमारी लड़ाई किसी एक धर्म या जाति से नहीं है, जुल्म करने वाला हर शख्स हमारा दुश्मन है। जुल्म ढाने वाले हिंदू व मुस्लिम दोनों समाज में हैं।
कहा कि तमाम मुश्किलों के बावजूद भारत के मुसलमान बेहतर स्थिति में हैं। हर कमजोर की मदद करना मुसलमानों की जिम्मेदारी है। हमें आदिवासियों की आवाज भी बुलंद करनी होगी। दलित आदिवासी संगठन के चेयरमैन अशोक भारती ने सरकार और न्यायपालिका को निशाने पर रखा। बोले, दलित व मुसलमानों पर हो रहे हमलों पर सरकारें चुप हैं। यहां तक कि छोटे-छोटे मुद्दों पर स्वत: संज्ञान लेकर मुकदमा चलाने वाली न्यायपालिका मुजफ्फरनगर व दादरी जैसे कांड पर चुप्पी साधे रही।