पिछले एक दशक में वैश्वीकरण और शहरीकरण का मानव इतिहास पर बहुत बुरा असर पड़ा है। 1800 के दशक में शहरी क्षेत्रों में रहने वाली दुनिया की आबादी 5 प्रतिशत से भी कम थी। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, वर्ष 2000 तक यह संख्या बढ़कर 47 प्रतिशत हो गई। आने वाले दस वर्षों के समय में ये संख्या 65 प्रतिशत तक पहुंचने की उम्मीद है। इसका असर हमारे खाने पर भी पड़ा है। आगे की स्लाइड में जानें कैसे
जैसे-जैसे ये बदलाव हुए हैं, हमने अपने आहार और खाने की आदतों में बदलाव देखा है। दुनियाभर में लोगों ने घर पर खाना बनाने की परंपरा को छोड़ना शुरू कर दिया है, जो ऐतिहासिक रूप से मौसमी, पौधे आधारित और फाइबर युक्त होते हैं।
अपनी सुविधा के अनुसार दुनिया ने रिफाइंड स्टार्च, शुगर, वसा, नमक, प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ, मांस और पशु-स्रोत उत्पादों की ओर रुख किया है। विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में, उपभोक्ता तेजी से सुपरमार्केट, फास्ट फूड आउटलेट, स्ट्रीट फूड वेंडर्स और टेक अवे रेस्तरां पर ज्यादा निर्भर होते जा रहे हैं।
आहार विकल्प और गतिहीन जीवन शैली ने मोटापे को महामारी के अनुपात में न केवल विकसित देशों में धकेल दिया है, बल्कि कम आय वाले देशों में भी यही हाल है, जहां भूख और मोटापा एक साथ बढ़ रहे हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, 67 करोड़ वयस्क और 16 करोड़ बच्चे दुनिया भर में मोटापे से पीड़ित हैं। आश्चर्य वाली बात तो ये है कि 82 करोड़ से अधिक लोग भूख से पीड़ित हैं।
बुरे आहार अब बीमारी का एक प्रमुख कारण हैं, जो दुनिया भर में होने वाली सभी मौतों में से एक तिहाई मौतों का मुख्य कारण हैं। विश्व खाद्य दिवस को मानाने का मुख्य उद्देश्य सिर्फ हमारे पारंपरिक पकवानों और पाक कला को सराहना ही नहीं बल्कि खाने और स्वास्थ्य से जुड़े इन मुद्दों पर ध्यान देने का एक प्रयास है। इस साल, इसका उद्देश्य हर जगह लोगों को इस विषय के तहत कार्रवाई करने के लिए प्रेरित करना है "हमारे कार्य हमारे भविष्य हैं।" (Our Choices are our Future)