हिंदुस्तान के किसी भी शहर की थाली बिना रोटी के पूरी नहीं होती है। चपाती, फुल्का या रोटी इसे कई सारे नामों से पुकारा जाता है। खाने की थाली चावल के साथ बिना रोटी के पूरी नहीं होती है। उत्तर-मध्य भारत की थाली का विशेष अंग ये रोटी खाने में जितनी आसान है बनाने में उतनी ही मुश्किल भी क्योंकि इसे बिल्कुल गोल बनाया जाता है साथ ही नर्म औैर मुलायम भी। लेकिन कभी आपने सोचा है कि इस रोटी का जन्म कैसे हुआ या सबसे पहले किसने रोटी बनाई होगी। तो आइए जानें ऐसे ही रोटी से जुड़े कुछ सवालों का जवाब।
वैसे तो खाने के लिए दूसरे देशों में ज्यादातर ब्रेड का प्रयोग किया जाता है लेकिन भारत में बनने वाली रोटी बहुत खास है क्योंकि इसे लगभग हर घर में महिलाएं रोज बनाती हैं। कहते है कि रोटी सबसे पहले पर्सिया से आई, जहां पर ये थोड़ी मोटी और मैदे की बनी होती थी। लेकिन आटे की बनी रोटी का जन्म पहले अवध में हुआ जहां पर गेंहू की पैदावार ज्यादा होती थी। गेंहू से बनने वाली इस रोटी का आटा थोड़ा मोटा और दरदरा होता था जो कि कुछ-कुछ आजकल बनने वाली रोटी जैसा होता था।
ऐसे ही बहुत सी कहानियां रोटी के इतिहास को लेकर प्रचलित है तो आइए जानने की कोशिश करें कि कैसे हुआ रोटी का जन्म।
ऐसे ही रोटी के बारे में एक प्रचलित कहानी है कि इसे पहले यात्रियों के खाने के लिए बनाया गया था जोकि कटोरी के आकार का होता था ताकि इसमें सब्जी को रखकर आसानी से खाया जा सके और किसी और बर्तन की जरूरत न पड़े।
हमारे देश में रोटी पुराने समय से ही बन रही है इसका प्रमाण पुराने ग्रंथों से मिलता है जिसमें कहा गया है कि रोटी हणप्पा काल में भी लोग बनाना जानते थे क्योंकि ये काल बहुत तरह के अनाज ज्वार, बाजरा, गेहूं और सब्जी को उगाना जानता था।
साथ ही रामचरितमानस में तुलसीदास ने 1600 ईसापूर्व में कटोरी से मिलती-जुलती रोटी का वर्णन किया है। संस्कृत में भी रोटी को रोटिका नाम से चिकित्सा ग्रंथ में कहा गया है। 16 वीं सदी में लिखी गई इस किताब में रोटी को सब्जी से खाने वाले पदार्थ के रूप में बताया गया है।