गेटेड आयन चैनल्स और ऑप्टोजेनेटिक्स की क्रांतिकारी खोज के लिए अमेरिका के कार्ल डिसेरोथ,जर्मनी के पीटर हेगेमैन व जॉर्ज नागेल को चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार मिला है। सरल शब्दों में समझें तो इन वैज्ञानिकों ने एक ऐसा संवेदनशील बायोलॉजिकल स्विच तैयार किया है, जिससे दिमाग के भीतर तंत्रिका कोशिकाओं को केवल नीली रोशनी की किरणों से ऑन-ऑफ किया जा सकता है।
मेडिसिन नोबेल पुरस्कार: नीली रोशनी से दिमाग की नसों को ऑन-ऑफ करने की तकनीक, वैज्ञानिकों की खोज को समझें
ऑप्टोजेनेटिक्स ऐसी तकनीक है जिसमें प्रकाश-संवेदनशील प्रोटीन की मदद से तंत्रिका कोशिकाओं की गतिविधि को नियंत्रित किया जा सकता है। वैज्ञानिकों ने लाइट-गेटेड आयन चैनल्स की खोज और उनके इस्तेमाल का रास्ता विकसित किया। इससे शोधकर्ता रोशनी की मदद से खास न्यूरॉन्स को सक्रिय या निष्क्रिय कर मस्तिष्क के कामकाज को समझ सकते हैं।
खोज की शुरुआत किसी लैब से नहीं, बल्कि तालाब के पानी में तैरने वाले एक सूक्ष्म हरे शैवाल से हुई थी। जर्मनी की हम्बोल्ट यूनिवर्सिटी के पीटर हेगेमैन ये शोध कर रहे थे कि क्लैमाइडोमोनास नामक हरा शैवाल रोशनी की ओर कैसे तैरता है? उन्होंने पाया कि इसके आई-स्पॉट में एक ऐसा प्रोटीन है जो प्रकाश पड़ते ही तुरंत इलेक्ट्रिकल सिग्नल पैदा करता है।
हेगेमैन और जॉर्ज नागेल ने इस प्रोटीन की पहचान की और इसे चैनलरोडोप्सिन नाम दिया। फिर कार्ल डेइसेरोथ ने चूहों के दिमाग के न्यूरॉन्स में इस जीन को डाला। एक ऑप्टिकल फाइबर तार के जरिए रोशनी दिमाग में भेजते ही चूहे की मूंछें हिलने लगीं।
नई खोज से खुलेंगे कई राज
नोबेल कमेटी की सदस्य प्रोफेसर अन्ना वेडेल ने बताया कि इंसानी दिमाग अब तक एक ब्लैक बॉक्स था जहां सिर्फ अनुमान लगाए जाते थे।
- अब वैज्ञानिकों के पास ऐसा टूल है जिससे यह पता लगाया जा सकता है कि कौन-सा न्यूरॉन किस हरकत या डर के लिए जिम्मेदार है?
- इस नई तकनीक का फायदा यह होगा कि जब किसी मरीज को मिर्गी का दौरा पड़ने वाला हो या फिर किसी व्यक्ति को ड्रग्स की तलब उठे, तो नीली रोशनी के स्विच से उन विशिष्ट कोशिकाओं को तुरंत शांत किया जा सकेगा।
क्लिनिकल ट्रायल में नजर आया चमत्कार
रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा जैसी आनुवंशिक बीमारी के कारण पूरी तरह अंधे हो चुके एक मरीज की आंखों में हानिरहित वायरस के जरिए चैनलरोडोप्सिन का जीन डाला गया। मरीज को एक खास चश्मा पहनाया गया जो दुनिया की तस्वीरों को रोशनी की सटीक तरंगों में बदलकर उसकी रेटिना पर प्रोजेक्ट करता था। इससे मरीज की आंशिक दृष्टि लौट आई।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।
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