शरीर के अलग-अलग हिस्सों में लगातार दर्द, हर समय बनी रहने वाली थकान, ठीक से नींद न आना और छोटी-छोटी बातों पर ध्यान लगाने में परेशानी बहुत आम है। इसे मेडिकल की भाषा में फाइब्रोमायल्जिया के नाम से जाना जाता है। फाइब्रोमायल्जिया से जूझ रहे लोगों के लिए ये समस्याएं रोजमर्रा की जिंदगी को मुश्किल बना देती हैं। लंबे समय से वैज्ञानिक इस बीमारी के पीछे छिपे कारणों को समझने की कोशिश कर रहे हैं। अब एक बड़े आनुवंशिक अध्ययन ने इस दिशा में महत्वपूर्ण सुराग दिए हैं।
अध्ययन: क्या दिमाग से जुड़ी है शरीर के हर हिस्से के दर्द की कहानी? फाइब्रोमायल्जिया पर बड़ा खुलासा
फाइब्रोमायल्जिया पर हुए अब तक के सबसे बड़े आनुवंशिक अध्ययनों में 25.6 लाख से अधिक लोगों के आंकड़ों से बीमारी से जुड़े 26 आनुवंशिक क्षेत्र मिले हैं। इनमें करीब आधे तंत्रिका तंत्र से जुड़े जीनों के आसपास हैं।
फाइब्रोमायल्जिया के बारे में जानिए
फाइब्रोमायल्जिया में पूरे शरीर में दर्द के साथ अत्यधिक थकान, नींद में व्यवधान, चिंता, अवसाद और ध्यान केंद्रित करने में परेशानी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इसके लक्षण हर मरीज में एक जैसे नहीं होते। बीमारी की पहचान के लिए अभी कोई सामान्य रक्त जांच उपलब्ध नहीं है, इसलिए इसका निदान कई बार चुनौतीपूर्ण रहता है। कई लोगों को याददाश्त और मानसिक स्पष्टता में कमी महसूस होती है, जिसे आमतौर पर ‘ब्रेन फॉग’ कहा जाता है।
अध्ययन में क्या पता चला?
नेचर मेडिसिन में प्रकाशित अध्ययन में शोधकर्ताओं ने 25 लाख लोगों के आनुवंशिक आंकड़ों का विश्लेषण किया। इनमें करीब 55 हजार लोग फाइब्रोमायल्जिया से पीड़ित थे। वैज्ञानिकों ने ऐसे आनुवंशिक बदलाव तलाशे, जो मरीजों में सामान्य आबादी की तुलना में अलग आवृत्ति में पाए जाते हैं। इन बदलावों से बीमारी के पीछे काम करने वाली जैविक प्रक्रियाओं के बारे में सुराग मिल सकते हैं। सबसे मजबूत आनुवंशिक संबंध ऐसे जीन के पास मिला, जिसका संबंध हंटिंगटन रोग से है।
इसलिए इसका यह अर्थ नहीं है कि फाइब्रोमायल्जिया वाले लोगों में हंटिंगटन रोग का खतरा बढ़ जाता है।
हंटिंगटन रोग एक दुर्लभ, आनुवंशिक और धीरे-धीरे बढ़ने वाली मस्तिष्क की बीमारी है। इसमें तंत्रिका कोशिकाएं क्षतिग्रस्त होने लगती हैं, जिससे अनियंत्रित हरकतें, सोचने-समझने में कमी और व्यवहार में बदलाव हो सकते हैं।
भविष्य में उपचार की नई राह खुलने की उम्मीद
शोधकर्ताओं का कहना है कि ये निष्कर्ष फाइब्रोमायल्जिया को केवल मनोवैज्ञानिक समस्या मानने की पुरानी धारणा को चुनौती देते हैं और इसके जैविक आधार के प्रमाण मजबूत करते हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि प्रतिरक्षा तंत्र या अन्य जैविक प्रक्रियाओं की भूमिका नहीं है।
बीमारी कई कारकों के मेल से विकसित हो सकती है।अध्ययन में शामिल लोगों की आनुवंशिक विविधता भी पूरी दुनिया की आबादी का प्रतिनिधित्व नहीं करती। फिर भी ये संकेत बीमारी के कारणों को समझने और भविष्य में नए उपचार विकसित करने के लिए वैज्ञानिकों को महत्वपूर्ण दिशा दे सकते हैं।
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स्रोत:
The genetic architecture of fibromyalgia across 2.5 million individuals
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