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अच्छी खबर: अंधेपन की समस्या को दूर करने वाले आई ड्रॉप की खोज, लौटेगी नवजातों के आंखों की रोशनी

Tue, 27 Oct 2020 03:55 PM IST
निलेश कुमार लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: निलेश कुमार Updated Tue, 27 Oct 2020 03:55 PM IST
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new exclusive eye drop for infants blindness causes symptoms prevention and treatment by Kingston university britain
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Instagram@RT

आंखे अनमोल होती हैं। इसी के जरिए हम दुनिया की तमाम खूबसूरती देख पाते हैं। आंखें न होने का दर्द वही जान सकता है, जो किसी कारणवश अंधे हो गए हों। बहुत से लोग जन्म से ही अंधे होते हैं। नवजातों में अंधेपन का कारण होता है नाइसेरिया गोनोरोहिया नाम का बैक्टीरिया, जिस पर दवाओं का असर ही नहीं होता। यह बैक्टीरिया संक्रमित मां से नवजात में पहुंचता है और शिशु के अंधेपन का कारण बनता है। अब, वैज्ञानिकों ने एक ऐसे आई ड्रॉप की खोज की है, जो नवजातों में इस तरह के अंधेपन की समस्या को दूर कर सकता है। ब्रिटेन की किंग्सटन यूनिवर्सिटी ने यह आई ड्रॉप तैयार किया है। आइए, जानते हैं इसके बारे में: 

new exclusive eye drop for infants blindness causes symptoms prevention and treatment by Kingston university britain
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Pixabay

दरअसल, ब्रिटेन की किंग्सटन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने ऐसा आई ड्रॉप तैयार किया है, जो नाइसेरिया गोनोरोहिया नाम के बैक्टीरिया पर असर दिखाते हुए अंधेपन की समस्या को दूर कर सकता है। किंग्सटन यूनिवर्सिटी का दावा है कि इस आई ड्रॉप से आंखों में बैक्टीरिया के संक्रमण को ठीक किया जा सकता है। शोधकर्ताओं का दावा है कि इस दवा से नवजातों की आंखों मे जलन भी नहीं होगी।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

शोधकर्ताओं का कहना है, नाइसेरिया गोनोरोहिया नाम का बैक्टीरिया सेक्सुअल ट्रांसमिशन के दौरान शिशु के पिता से पहले मां में पहुंचता है और फिर मां से यह नवजात में आ जाता है। उनका कहना है कि इस बैक्टीरिया पर एंटीबायोटिक दवाएं भी बेअसर साबित हो रही हैं। इस बैक्टीरिया का असर नवजातों की आंखों पर पड़ रहा है और ऐसे में अगर इस बैक्टीरियल संक्रमण का इलाज न हो तो शिशु के आंखों की रोशनी हमेशा के लिए चली जाती है। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

आई ड्रॉप तैयार करने वाले शोधकर्ताओं का कहना है, इसमें एंटी माइक्रोबियल एजेंट मोनोकाप्रिन का प्रयोग किया है। यह बेहद ही सस्ता विकल्प है, जिसे दुनिया के किसी भी देश के किसी भी हिस्से में आसानी से उपलब्ध कराया जा सकता है। ब्रिटेन की किंग्सटन यूनिवर्सिटी की यह खोज पूरी दुनिया के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

शोधकर्ताओं में शामिल डॉ. लोरी सिंडर का कहना है कि कई तरह के बैक्टीरिया पर एंटीबायोटिक दवाएं बेअसर साबित हो रही हैं। ऐसे में उन्हें खत्म करने के लिए नए विकल्प ढूंढना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि हमने इस आई ड्रॉप में मोनोकाप्रिन का इस्तेमाल किया, जिसके खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित करना बैक्टीरिया के बहुत मुश्किल होगा। यह आई ड्रॉप नवजातों में अंधेपन की समस्या को दूर करेगी।

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