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भारत में कोरोना की संभावित तीसरी लहर के खतरे को देखते हुए स्वास्थ्य विशेषज्ञ सभी लोगों से जल्द से जल्द वैक्सीन लगवाने की अपील कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि वैक्सीन कोरोना के गंभीर खतरे और मौत से बचाने में बेहद कारगर साबित हो सकती है। हालांकि वैक्सीनेशन को लेकर हाल ही में हुए एक अध्ययन में चौंकाने वाले परिणाम सामने आए हैं। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के वैज्ञानिकों ने अपने हालिया शोध में बताया है कि ऑक्सफ़ोर्ड/एस्ट्राजेनेका की कोविशील्ड वैक्सीन ले चुके ज्यादातर लोगों में संक्रमण से सुरक्षा देने वाली एंटीबॉडीज ही नहीं पाई गई हैं। आईसीएमआर के वैज्ञानिकों ने वैक्सीन की एक और दोनों डोज ले चुके लोगों के ब्लड सीरम सैंपल की जांच की, लेकिन इसके परिणाम संतोषजनक नहीं पाए गए हैं। इस अध्ययन का पीर-रिव्यू होना अभी बाकी है।
इस रिपोर्ट ने लोगों के बीच असमंजस्य की स्थिति पैदा कर दी है। सवाल उठने शुरू हो गए हैं कि क्या कोविशील्ड वैक्सीव प्रभावी नहीं है? जिन लोगों का टीकाकरण हो चुका है क्या उन्हें सुरक्षित माना जा सकता है? आइए इस बारे में विस्तार से जानने की कोशिश करते हैं।
बड़ा सवाल: क्या संक्रमण से बचाने में प्रभावी नहीं है कोविशील्ड वैक्सीन? जानिए क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
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आईसीएमआर का अध्ययन
आईसीएमआर के वैज्ञानिकों ने कोविशील्ड वैक्सीन की केवल एक और दोनों डोज ले चुके लोगों पर अध्ययन किया। इसमें वैज्ञानिकों ने पाया कि वैक्सीन की एक डोज ले चुके करीब 58 फीसदी जबकि दोनों खुराक ले चुके 16 फीसदी लोगों में एंटीबॉडीज ही नहीं देखी गई हैं। हालांकि इस संबंध में क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज-वेलोर में माइक्रोबायोलॉजी विभाग के पूर्व प्रमुख डॉ टी जैकब जॉन का कहना है कि अध्ययन में एंटीबॉडीज का न दिखने का मतलब यह नहीं है कि शरीर में एंटीबॉडीज बनी ही नहीं हैं। संभव है कि एंटीबॉडीज कम बनी हों जो फिलहाल अध्ययन में पता न चली हों।
न्यूट्रलाइजिंग एंटीबॉडीज की भी कमी
वैज्ञानिकों ने अध्ययन में बताया है कि वायरस को विशेष रूप से लक्षित करके मारने और मानव कोशिकाओं में प्रवेश करने से रोकने वाले न्यूट्रलाइजिंग एंटीबॉडीज टाइट्रेस भी डेल्टा वैरिएंट्स के खिलाफ कम पाए गए हैं। सीरम सैंपल के अध्ययन में पहली लहर का कारण बनने वाले बी1 वैरिएंट्स और डेल्टा वैरिएंट्स की बीच न्यूट्रलाइजिंग एंटीबॉडीज टाइट्रेस का अध्ययन किया गया। इसमें वैज्ञानिकों ने पाया कि वैक्सीन की केवल एक शॉट ले चुके लोगों में बी1 की तुलना में डेल्टा वैरिएंट के खिलाफ न्यूट्रलाइजिंग एंटीबॉडीज 78 फीसदी जबकि दो शॉट लेने वालों में 69 फीसदी तक कम पाई गई है।
क्या कहते हैं स्वास्थ्य विशेषज्ञ?
आईसीएमआर के इस अध्ययन के बाद से ही लोगों के मन में वैक्सीनेशन को लेकर तरह-तरह के सवाल हैं। इसी बारे में जानने के लिए अमर उजाला ने इंदौर में कोविड ट्रैकिंग प्रभारी डॉ अनिल डोंगरे से बातचीत की। डॉ अनिल डोंगरे कहते हैं वैक्सीनेशन को लेकर कई स्तरों पर परीक्षण और अध्ययन किए जा रहे हैं। वैक्सीन प्रभावी नहीं है ऐसा मान लेना सही नहीं है। वैक्सीन लगने के 10-14 दिनों बाद ही एंटीबॉडीज का सही अंदाजा लगाया जा सकता है, कुछ लोगों में एंटीबॉडीज बनने में और भी वक्त लग सकता है। संभव है कि ब्लड सीरम का सैंपल वैक्सीनेशन के कुछ दिनों के बाद ही ले लिया गया हो, जिससे सही परिणाम सामने न आए हों। कोविशील्ड वैक्सीन को लेकर दुनियाभर में हुए अन्य अध्ययनों में इसे काफी प्रभावी भी बताया गया है। फिलहाल हमें इतना मानकर चलना चाहिए कि वैक्सीन संक्रमण के खतरे से बचाने में हमारी मदद करती है, सभी लोगों को वैक्सीन जरूर लगवानी चाहिए।
बूस्टर डोज की पड़ सकती है जरूरत
डॉ अनिल कहते हैं कि जिस तरह से वायरस में एक के बाद एक म्यूटेशन के मामले सामने आ रहे हैं, ऐसे में संभव है कि वैक्सीन की दोनों डोज के बाद एक तीसरे बूस्टर डोज की भी आवश्यकता पड़ सकती है। फिलहाल देश में टीके की दो ही खुराक दी जा रही हैं, कई अध्ययनों में दो खुराक को काफी असरदार भी बताया गया है। जहां तक बात आईसीएमआर के इस अध्ययन की है तो इसका पीर-रिव्यू होना अभी बाकी है। उसके बाद ही इस संबंध में कुछ कहा जा सकता है। हालांकि सभी लोगों को इतना जरूर ध्यान रखना है कि कोरोना से बचाव के लिए वैक्सीनेशन ही सबसे प्रभावी तरीका है।
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नोट: यह लेख वैक्सीनेशन को लेकर सामने आए इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के अध्ययन औऱ इसपर इंदौर में कोविड ट्रैकिंग प्रभारी डॉ अनिल डोंगरे से बातचीत के आधार पर तैयार किया गया है।
अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।