कोरोना संक्रमण काल में वेंटिलेटर की भूमिका संजीवनी की तरह हो गई है। कोरोना वायरस के संक्रमण के बाद व्यक्ति को सांस लेने में तकलीफ होती है और जब यह तकलीफ बढ़ जाती है, तो वेंटिलेटर की आवश्यकता होती है। कहा जाता है कि आवश्यकता ही आविष्कार की जननी होती है। दुनियाभर में वेंटिलेटरों के अभाव ने यह बात एक बार फिर सही साबित कर दी। चूंकि कोरोना से लड़ाई में सबसे महत्वपूर्ण हथियार वेंटिलेटरों की संख्या को ही माना जा रहा है, इसलिए इनकी कमी को देखते हुए हर देश में अनोखे नवाचार करने वाले युवा इंजीनियर और वैज्ञानिक सामने आने लगे हैं। दुनिया में वेंटिलेटर बनाने के कई किफायती तरीके आ गए हैं।
कोरोना के इलाज में स्लीप एप्निया मशीन से लेकर सलून हेयर ड्रायर तक पूरी कर रहे वेंटिलेटर की कमी
स्लीप एपनिया मशीन से लेकर हेयर ड्रायर तक
भारत, अमेरिका, ब्रिटेन समेत कई देशों में सरकार ही नहीं, कॉरपोरेट जगत ने भी नवाचारों में पहल की। अमेरिका में नॉर्थशोर यूनिवर्सिटी अस्पताल में स्लीप एपनिया के लिए बनी मशीन का उपयोग किया जा रहा है। वहीं, न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में हुडेड हेयर ड्रायर के जरिए व्यक्तिगत चैंबर बनाकर ऑक्सीजन दी जा रही है। इससे एरोसोल से संक्रमण की आशंका भी कम हो रही है।
लंचबॉक्स के आकार वाली सीपीएपी भी
न्यूयॉर्क में कुछ हफ्तों में मरीजों के बढ़ने से कम परिष्कृत श्वसन मशीनों का रुख किया गया। पल्मोनोलॉजिस्टों का कहना है, लंचबॉक्स के आकार वाली सीपीएपी और बाईपीएपी मशीनें ज्यादातर लोगों के लिए उपयोगी हैं। अमेरिकियों के लिए स्लीप एपनिया व फेफड़ों के गंभीर रोगों में इनका इस्तेमाल किया जाता रहा है। कई दिनों में अमेरिका में थ्रीडी प्रिंटर के जरिए अस्थायी वेंटिलेटर पर तेजी से काम हुआ है।
100 संक्रमित मरीजों पर इस्तेमाल
बताया जा रहा है कि अकेले नॉर्थ शोर यूनिवर्सिटी अस्पताल में ही 100 संक्रमितों को इन मशीनों पर बचाए रखा गया है। सांस के अन्य रोगियों के लिए भी इनका इस्तेमाल हुआ है। मरीजों में फेफड़ों के मध्यम संक्रमण के दौरान यह सहायक साबित हुए हैं। कई अस्पतालों में डॉक्टर संक्रमितों को इनट्युबेट करने की बजायछोटी मशीनों के जरिए ही उनमें ऑक्सीजन का स्तर बढ़ा रहे हैं। इनसे प्रवाहित वायु के दबाव से क्षतिग्रस्त फेफड़ों में भरे तरल को भी बाहर निकालने का काम किया जा रहा है।
संशय दूर करने होंगे
हालांकि कुछ विशेषज्ञ कम परिष्कृत मशीनों पर ज्यादा भरोसा नहीं जता रहे। उनका कहना है, 2017 में एक अध्ययन में पाया गया था कि लंबे समय तक सीपीएपी मशीनों के इस्तेमाल से श्वसन समस्या वाले 80 फीसदी लोगों के फेफड़े खराब हो गए थे। युवाओं में यह जोखिम ज्यादा देखने को मिला था।ऐसे विशेषज्ञ भी हैं, जो कुछ मरीजों के लिए इन मशीनों को लाभदायक मानते हैं। लेकिन उनका कहना है कि ऐसे मरीजों की पहचान करना चुनौतीपूर्ण काम है।