कोरोना के घातक डेल्टा वैरिएंट्स के मामले दुनियाभर में तेजी से बढ़ रहे हैं। कई देशों में दोबारा लॉकडाउन लगाने जैसी स्थिति जन्म ले रही है। पर क्या लॉकडाउन को सुरक्षित तरीके के रूप में देखा जा सकता है? हाल की कुछ रिपोर्टस के आधार पर इस तरह के सवाल खड़े होने शुरू हो गए हैं। कई देशों से मिल रही रिपोर्टस में कोरोना के साथ-साथ लॉकडाउन के दुष्प्रभावों के मामले भी सामने आ रहे हैं। न्यूजीलैंड ऐसा ही देश है, जहां पर लॉकडाउन से संबंधित साइड-इफेक्ट्स के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। रिपोर्टस के मुताबिक पिछले दिनों अस्पतालों में श्वसन वायरस के शिकार बच्चों की संख्या तेजी से बढ़ी है। डॉक्टरों का कहना है कि लॉकडाउन के कारण 'इम्यूनिटी डेब्ट' की स्थिति पैदा हो गई है, चिंताजनक बात यह है कि छोटे बच्चे इसके ज्यादा शिकार हो रहे हैं। कई बच्चों की स्थिति इस कदर गंभीर हो गई है कि उन्हें ऑक्सीजन सपोर्ट पर रखा गया है।
लॉकडाउन के साइड-इफेक्ट: कोरोना से ज्यादा बचाव भी पड़ रहा है भारी, छोटे बच्चों में बढ़ी यह गंभीर बीमारी
क्यों बढ़ रहे हैं रेस्पिरेटरी सिंकाइटियल वायरस के मामले?
रेस्पिरेटरी सिंकाइटियल वायरस (आरएसवी) एक सामान्य प्रकार की सांस से संबंधित बीमारी है। डॉक्टर, कोविड लॉकडाउन के कारण उत्पन्न इम्यूनिटी डेब्ट को इसके प्रमुख कारण के रूप में देख रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि कोरोना में लगे लॉकडाउन के कारण लोग, विशेषकर बच्चों में अन्य सामान्य वायरस के खिलाफ प्रतिरक्षा उत्पन्न नहीं हो सकी है, इसी के चलते आरएसवी के मामले इतनी तेजी से बढ़ रहे हैं।
इस वजह से बच्चे हो रहे हैं ज्यादा शिकार
न्यूजूलैंड में महामारी विज्ञानी और सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रोफेसर माइकल बेकर ने इस समस्या को 'जंगल के आग' की संज्ञा दी है। प्रोफेसर माइकल कहते हैं, यदि जंगल में एक या दो साल तक आग ही न लगे तो जमीन में अधिक ईंधन उत्पन्न हो जाता है। अंत में जब आग लगती है, तो वह और भी भयंकर रूप ले सकती है, मौजूदा स्थिति ऐसी ही है। आरएसवी का संक्रमण सामान्यतौर पर लोगों के लिए इतनी समस्या उत्पन्न नहीं करता है। चूंकि बच्चों में इसके खिलाफ एक-दो साल से प्रतिरक्षा नहीं बन पाई है, इस वजह से अब संक्रमित हो रहे बच्चों में इसके गंभीर मामले देखने को मिल रहे हैं। लॉकडाउन में जो बच्चे पैदा हुए हैं, उनमें इसके खिलाफ इम्यूनिटी बिल्कुल नहीं है।
कोविड से बचाव के उपायों का भी असर
डॉक्टर बताते हैं, कोविड-19 से बचाव के लिए लॉकडाउन, हाथ धोने, सामाजिक दूरी और मास्क जैसे उपाय न केवल कोविड-19 को नियंत्रित करने में प्रभावी हैं, साथ ही यह अन्य बीमारियों के प्रसार को भी धीमा कर देते हैं। यही कारण है कि पिछले एक-दो साल में फ्लू, सामान्य सर्दी, और आरएसए जैसी बीमारियां कम देखी गई हैं। न्यूजीलैंड में, पिछली सर्दियों में लॉकडाउन के कारण फ्लू के मामलों में 99.9% और आरएसवी में 98% की कमी दर्ज की गई थी। यही कारण है कि यह संक्रमण अब गंभीर रूप लेकर बच्चों को परेशान कर रहे हैं। पर्यावरण विज्ञान और अनुसंधान संस्थान के अनुसार, न्यूजीलैंड में पिछले एक महीने में 1,000 से ज्यादा आरएसवी संक्रमण के मामले दर्ज किए गए हैं। वहीं 29-सप्ताह की सर्दियों के मौसम में संक्रमण का सामान्य औसत 1,743 था। इसी तरह ऑस्ट्रेलिया संक्रमण के मामलों में उछाल देखा जा रहा है। कई अस्पतालों में संक्रमित बच्चों के मामले तेजी से बढ़े हैं।
बच्चों में तमाम संक्रमणों के खिलाफ प्रतिरक्षा विकसित होना जरूरी
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि अल्पावधि में तो इन बीमारियों के न होने को अच्छा माना जा सकता है लेकिन इसके दीर्घकालिक प्रभाव नुकसानदायक हो सकते हैं। सामान्य तौर पर जन्म के पहले साल ही बच्चे आरएसवी और फ्लू आदि से संक्रमित होकर उनके खिलाफ प्रतिरक्षा विकसित कर लेते हैं। यदि लंबे समय तक बच्चों में बैक्टीरिया और वायरल संक्रमण नहीं होते हैं तो स्वाभाविक है कि वे उन संक्रमणों के खिलाफ प्रतिरक्षा विकसित नहीं कर पाएंगे। ऐसे बच्चों में पहली बार यह संक्रमण अधिक गंभीर रूप ले सकता है। न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में फिलहाल यही देखने को मिल रहा है।
-------------
स्रोत और संदर्भ:
children falling ill in high numbers due to Covid ‘immunity debt
अस्वीकरण नोट: यह लेख तमाम मीडिया रिपोर्टस में छपी जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। लेख में शामिल सूचना व तथ्य आपकी जागरूकता और जानकारी बढ़ाने के लिए साझा किए गए हैं। ज्यादा जानकारी के लिए आप अपने चिकित्सक से संपर्क कर सकते हैं।