ओवरथिकिंग यानी दिमाग में एक ही बात को बार-बार दोहराते रहना, उसी पर विचार करते रहना। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है-ओवर का मतलब बहुत ज्यादा और थिकिंग का मतलब- किसी विषय पर सोचते रहना।
मेंटल हेल्थ: दिमाग में लगातार चलती रहती है एक ही बात? जानिए ओवरथिंकिंग कब बन जाती है समस्या
हर बात पर विचार करना सामान्य है, लेकिन जब वही विचार बार-बार लौटें, समाधान न निकलें और नींद-काम या रिश्तों पर असर पड़ने लगे तो यह समस्या बन सकती है। लगातार नकारात्मक सोच कई बार चिंता और अवसाद की दिक्कतों से संबंधित हो सकती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, ओवरथिंकिंग का मतलब यह नहीं कि ज्यादा सोचने वाला हर व्यक्ति मानसिक बीमारी का शिकार है। समस्या तब बन जाती है जब सोचने से समाधान निकलने के बजाय तनाव बढ़ने लगे। ज्यादा सोचते रहने की आदत जब आपकी नींद खराब करने लगे, काम पर ध्यान न लगे या आप सामान्य गतिविधियों से दूर होने लगें तो अलर्ट हो जाना चाहिए।
पहले सोच और ओवरथिंकिंग में फर्क समझें
किसी समस्या पर विचार करना सामान्य है। नौकरी से जुड़ी परेशानी है तो उसके समाधान के विकल्प सोचना सामान्य माना जाता है। लेकिन अगर वही बात घंटों चलती रहे और कोई निर्णय या समाधान सामने न निकल पाए, तो यह दोहराव वाली सोच बन सकती है।
इसमें व्यक्ति बार-बार वही सवाल करता है- ऐसा क्यों हुआ, मैंने ऐसा क्यों कहा, आगे क्या होगा? शोध में दोहराव वाली नकारात्मक सोच चिंता और अवसाद के खतरे को बढ़ा सकती है।
ओवरथिंकिंग की आदत आपके जीवन और नींद को प्रभावित करने लग जाती है।
- कई बार रात-रात भर विचारों का सिलसिला चलता रहता है और नींद आने में परेशानी हो सकती है।
- इससे काम के बीच ध्यान बार-बार भटकने लगता है और आप घंटों एक ही बात को लेकर परेशान रह सकते हैं। इस तरह की दिक्कतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
- स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, लंबे समय तक बनी रहने वाली नकारात्मक सोच धीरे-धीरे चिंता, अवसाद और भावनात्मक परेशानियों को बढ़ाने वाली हो सकती है।
समय पर लें डॉक्टरी मदद
ओवरथिंकिंग में दिमाग व्यस्त रहता है, लेकिन आमतौर पर जिस समस्या को लेकर विचार चल रहे होते हैं उसका कोई हल नहीं निकल पाता। बार-बार पुरानी घटनाओं को दोहराने से आप कई बार खुद को दोष देने लग जाते हैं। ये स्थितियां मानसिक स्वास्थ्य के लिए मुश्किलें बढ़ाने वाली हो सकती हैं।
डॉक्टर कहते हैं, अगर लगातार सोचने की वजह से नींद, काम, रिश्ते या रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो रही है, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से तुरंत सलाह लें। मदद लेने का मतलब यह नहीं कि समस्या बहुत बड़ी हो चुकी है। समय पर मनोवैज्ञानिक सहायता लेने से सोचने के इस पैटर्न को समझने और बदलने में मदद मिल सकती है।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।
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