भारत में कोरोना के अब तक 62 लाख से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें से 51.87 लाख से ज्यादा लोग ठीक हो चुके हैं और तकरीबन 10 लाख के आसपास अब भी एक्टिव मामले हैं। पिछले दिनों केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री का एक बयान सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ, जिसमें स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ये कहते सुने जा सकते हैं कि भारत अभी हर्ड इम्यूनिटी से काफी दूर है। पिछले तीन रविवार से देश के स्वास्थ्य मंत्री जनता से 'संडे संवाद' कर रहे हैं। इस दौरान लोग उनसे सवाल पूछते हैं और वो चुनिंदा सवालों के जवाब देते हैं।
Coronavirus: भारत में वैक्सीन के मुकाबले हर्ड इम्यूनिटी का इंतजार करना क्या सही होगा?
इस सवाल के जवाब में स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ने कहा, "आईसीएमआर ने देश में अब तक दो सीरो सर्वे किए हैं। पहला मई के महीने में किया था। उस वक्त पता चला था कि देश में 0.73 फीसदी लोग कोरोना संक्रमण की चपेट में हैं। दूसरा सीरो सर्वे हाल ही में आईसीएमआर ने किया है। इसमें देश के 21 राज्यों के 70 जिलों से सैम्पल लिए गए। इस सीरो सर्वे के नतीजों से ये पता चलता है कि भारत अभी भी हर्ड इम्यूनिटी की स्थिति से काफी दूर है।
स्वास्थ्य मंत्री के जवाब के बाद से ही जनता सोशल मीडिया पर हर्ड इम्यूनिटी के बारे में कई तरह के सवाल पूछ रही है जैसे हर्ड इम्यूनिटी क्या है, कब तक आएगी और इसका इंतजार क्यों करना चाहिए? ये रिपोर्ट एक कोशिश है कि हर्ड इम्यूनिटी से जुड़े आपके तमाम सवालों का जवाब एक जगह ही दिया जा सके।
स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन के मुताबिक, "किसी भी जनसंख्या में हर्ड इम्यूनिटी की स्थिति तब हासिल की जाती है जब जनसंख्या के 60 से 70 फीसदी लोगों में बीमारी फैल जाती है। अगर सीरो सर्वे के नतीजे ये बता रहे हैं कि भारत में हर्ड इम्यूनिटी वाली स्थिति नहीं आई है, तो इससे ये निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भारत में अब भी ऐसी बहुत बड़ी जनसंख्या है जो कोविड-19 की बीमारी से अब तक बची हुई है। जनता पूरी तरह सीरो सर्वे के नतीजों के बारे में ठीक से समझ नहीं पाई है। इसलिए लोगों को सावधानी बरतना नहीं छोड़ना चाहिए।"
हर्ड इम्यूनिटी क्या है?
अगर कोई बीमारी आबादी के बड़े हिस्से में फैल जाती है और इंसान की रोग प्रतिरोधक क्षमता उस बीमारी के संक्रमण को बढ़ने से रोकने में मदद करती है तो जो लोग बीमारी से लड़कर पूरी तरह ठीक हो जाते हैं, वो उस बीमारी से 'इम्यून' हो जाते हैं, यानी उनमें प्रतिरक्षात्मक गुण विकसित हो जाते हैं। उनमें वायरस का मुकाबला करने को लेकर सक्षम एंटी-बॉडीज तैयार हो जाती हैं। जब कुल आबादी के 60 से 70 फीसदी लोग, किसी बीमारी से प्रभावित हो जाते हैं तो माना जाता है कि उस आबादी में 'हर्ड इम्यूनिटी' की स्थिति पहुंच गई है। इससे उन 30-40 फीसदी लोगों को भी परोक्ष रूप से सुरक्षा मिल जाती है जो ना तो संक्रमित हुए और ना ही उस बीमारी के लिए 'इम्यून' हैं।
ऐसा इसलिए भी मुमकिन हो पाता है क्योंकि वायरस जब भी दूसरे के शरीर में इंफेक्शन पैदा करने के लिए तैयार होता है, तो वो पहले से ही संक्रमित होता है, उनके पास पहले से ही इम्यूनिटी होती है। ऐसे में 'चेन ऑफ ट्रांसमिशन' टूट जाती है। पब्लिक हेल्थ केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. के श्रीनाथ रेड्डी इसको एक उदाहरण के साथ समझाते हैं। हर्ड इम्यूनिटी बिना संक्रमण वालों को वैसे ही सुरक्षा देती है जैसे कि एक वीआईपी चल रहा है और उसके आस पास कई गार्ड हैं, जो उन्हें सुरक्षा प्रदान कर रहे हैं।