मध्यप्रदेश के हरदा जिले में मंगलवार (6 फरवरी) को पटाखा फैक्ट्री में हुए धमाके ने लोगों में दहशत भर दिया है। हादसे की चपेट में आए 14 से अधिक लोगों की मौत हो गई, बड़ी संख्या में लोग अपंग भी हुए हैं। धमाके बाद कहीं किसी का कटा हाथ पड़ा मिला तो कहीं किसी के पैर का पंजा। दूर उछलकर गिरी लाशों और कुछ ही मिनटों में फैली तबाही के मंजर को देखने वाले लोग सदमे में हैं।
हरदा हादसे का दुष्प्रभाव: मनोचिकित्सक का सुझाव- पीटीएसडी के संभावित खतरे से बचाव के करें उपाय
स्थानीय लोगों में हो सकता है पीटीएसडी का खतरा
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने अलर्ट करते हुए कहा है कि हरदा में हुए हादसे के बाद स्थानीय लोगों में पीटीएसडी (पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर) की समस्या विकसित होने का खतरा बढ़ सकता है। लंबे समय तक इस हादसे के दुष्प्रभाव बने रहने का जोखिम हो सकता है।
पीटीएसडी को चिंता विकार, गंभीर अवसाद, अनिद्रा, ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों का प्रमुख कारण माना जाता है। इस बात की आशंका है कि हरदा के लोगों में इन विकारों का खतरा अधिक हो सकता है।
क्या कहते हैं मनोचिकित्सक
अमर उजाला से बातचीत में भोपाल स्थित मनोचिकित्सक डॉ सत्यकांत त्रिवेदी कहते हैं, धमाके, प्राकृतिक आपदा जैसे खौफनाक मंजर का सामना करने वाली जगहों पर स्थानीय लोगों में पीटीएसडी के आंकड़ों में उछाल देखा जाता रहा है। आने वाले महीनों में हरदा और आसपास के इलाके में भी लोगों में इसका खतरा हो सकता है।
विपरीत परिस्थितियां पीटीएसडी का प्रमुख कारक रही हैं। जो लोग इन विपरीत परिस्थितियों से गुजर रहे हैं, उन्हें अगर अपनी भावनाओं को कंट्रोल करने में समस्या आ रही है तो पेशेवर सलाह ले सकते हैं। स्थानीय चिकित्सा विभाग को भी लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीरता से ध्यान देनी की आवश्यकता है।
अमर उजाला के माध्यम से जो लोग ये आर्टिकल पढ़ रहे हैं, उन्हें भी हरदा में अपने दोस्तों-रिश्तेदारों से लगातार संपर्क में रहना चाहिए। नकारात्मक परिस्थितियों में अपनों के साथ-सहयोग से मानसिक स्वास्थ्य विकारों से बचाव में मदद मिल सकती है।
क्या होता है पीटीएसडी की समस्या?
पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी) मानसिक स्वास्थ्य विकारों की स्थिति है जो किसी भयानक घटना से उत्पन्न होती है। किसी भयानक हादसे का अनुभव करने या उसे देखने वाले लोगों में इसका खतरा अधिक होता है। पीटीएसडी के कारण दिमाग में घटना का फ्लैशबैक चलता रह सकता है, बुरे सपने और गंभीर चिंता के साथ ही घटना के बारे में अनियंत्रित विचार आते रह सकते हैं।
कई लोगों में इस तरह की समस्या महीनों-वर्षों तक बनी रह सकती है। पीटीएसडी की स्थिति प्रतिदिन के कामकाज में बाधा बन सकती है, इसका क्वालिटी ऑफ लाइफ पर भी असर होने का खतरा रहता है।
रिश्तेदारों-साथियों की विशेष भूमिका
डॉ सत्यकांत बताते हैं, पीटीएसडी के शिकार लोगों के लिए आपकी नौकरी, रिश्ते, स्वास्थ्य और रोजमर्रा की गतिविधियों का आनंद भी कम होने लगता है। अवसाद और चिंता जैसे विकारों का खतरा ,नशीली दवाओं या अल्कोहल के सेवन की समस्या भी बढ़ सकती है।
यहां रिश्तेदारों की बड़ी भूमिका हो सकती है। रिश्तेदारों-साथियों से मिलने वाले समर्थन से तनाव की समस्या को कम करने और पीटीएसडी विकसित होने से रोकने में मदद मिल सकती है। हादसे का सामना करने वाले लोगों को स्वयं से भी मानसिक स्वास्थ्य का ख्याल रखना जरूरी है।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।
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