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Coronavirus: भारत में आ सकती है कोरोना की एक और लहर, डराने वाली है ये रिपोर्ट

Tue, 20 Oct 2020 12:20 PM IST
सोनू शर्मा लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सोनू शर्मा Updated Tue, 20 Oct 2020 12:20 PM IST
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Coronavirus peak in India Another wave of covid 19 can come in the country
भारत में कोरोना मामले - फोटो : Pixabay

क्या भारत में कोरोना वायरस संक्रमण के मामलों का पीक आ चुका है? क्या अगले साल की शुरुआत तक इस पर नियंत्रण पाया जा सकता है? भारत के शीर्ष वैज्ञानिकों का एक समूह ऐसा ही मानता है। उनका नया मैथमैटिकल मॉडल दिखाता है कि भारत ने सितंबर में ही कोरोना संक्रमण के मामलों का पीक पार कर लिया था और इसे अगले साल फरवरी तक इसे नियंत्रित किया जा सकता है। 



पीक वो स्थिति है जिसके बाद मामलों की संख्या घटनी शुरू होती है। ऐसे सभी मॉडल मानकर चलते हैं कि लोग आगे भी मास्क पहनते रहेंगे, भीड़-भाड़ वाली जगहों पर नहीं जाएंगे, सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करेंगे और नियमित रूप से हाथ धोएंगे। भारत में अब तक कोरोना वायरस के 75 लाख मामले आ चुके हैं और 114610 लोगों की मौत हो चुकी है। हालांकि, पूरी दुनिया में वायरस से होने वाली मौतों का केवल 10 फीसदी हिस्सा भारत में है। यहां कोरोना वायरस से होने वाली मृत्यु दर दो प्रतिशत से नीचे है जो दुनिया में सबसे कम है।  

Coronavirus peak in India Another wave of covid 19 can come in the country
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

सितंबर मध्य तक पीक

भारत में सितंबर मध्य तक पीक की स्थिति बन गई थी। उस समय यहां 10 लाख से ज्यादा एक्टिव मामले हो चुके थे। तब से भारत में कोरोना संक्रमण के मामले लगातार घट रहे हैं। पिछले हफ्ते तक भारत में हर दिन औसतन 62,000 मामले आए और 784 मौतें हुईं। कई राज्यों में कोविड-19 के कारण रोजाना होने वाली मौतों में भी कमी आ रही है। लगातार टेस्ट किए जा रहे हैं। पिछले हफ्ते हर दिन औसतन एक लाख से अधिक सैंपल की जांच की गई है। 

भारत सरकार द्वारा कराए गए इस ताजा मैथमैटिकल अध्ययन का हिस्सा रहे सात वैज्ञानिकों में माइक्रोबायोलॉजिस्ट डॉक्टर गगनदीप कांग भी शामिल हैं। वह रॉयल सोसाइटी ऑफ लंदन की फेलो चुनी जाने वालीं पहली भारतीय महिला हैं। अन्य बातों के अलावा इस अध्ययन में लोगों के संक्रमित होने की दर, उनके ठीक होने या मरने की दर और महत्वपूर्ण लक्षणों वाले संक्रमित लोगों की संख्या पर भी ध्यान दिया गया है। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

लॉकडाउन से मिला फायदा

वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर मार्च में लॉकडाउन नहीं होता तो भारत में एक्टिव मामलों की संख्या एक करोड़ 40 लाख से ज्यादा पहुंच चुकी होती। वहीं, कोविड-19 से 26 लाख लोगों की मौत हो चुकी थी, जो मौजूदा मौत के आंकड़ों से 23 गुना ज्यादा है। दिलचस्प है कि बिहार और उत्तर प्रदेश में हुए अध्ययन में आए नतीजे कहते हैं कि इन दोनों राज्यों में बिना पर्याप्त जांच व सावधानी के लौटे प्रवासी मजदूरों का कोरोना के मामलों पर बहुत कम असर पड़ा है। 

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, हैदराबाद में प्रोफेसर माथुकुमल्ली विद्यासागर बताते हैं, 'यहां जून तक पीक आ गया होता। इससे हमारे अस्पतालों पर भारी बोझ पड़ता और लोगों में डर फैल जाता। लॉकडाउन से कर्व को फ्लैट करने में मदद मिली है।' प्रोफेसर विद्यासागर रॉयल सोसाइटी ऑफ लंदन में फेलो भी हैं। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

सर्दियां और प्रदूषण बने चुनौती

लेकिन, भारत में अब त्योहारों का मौसम है जब लोग एक-दूसरे से खुलकर मिलते-जुलते हैं। ऐसे में एक भी सुपरस्प्रेडर और लोगों के मिलने-जुलने में तेजी दो हफ्ते में पूरी सूरत बदल सकते हैं। उदाहरण के लिए केरल में त्योहार के बाद सितंबर में बहुत तेजी से मामले बढ़े थे। वैज्ञानिकों ने मामलों में अचानक तेजी आने की चेतावनी दी है। उनका कहना है कि अगर लोग कोरोना वायरस से सुरक्षा के उपाय अपनाने छोड़ देंगे तो अक्तूबर में 26 लाख मामलों के साथ पीक आ सकता है। 


प्रोफेसर विद्यासागर कहते हैं, 'अगर लोग सुरक्षा के उपायों का पालन करते हैं तो हमारे सभी अनुमान ठीक बैठेंगे। हमारा मानना है कि भारत में सितंबर में ही पीक आ गया था। हमें ढिलाई नहीं करनी चाहिए। ये सोचना इंसानी प्रवृति है कि जो बुरा होना था वो हो चुका, आगे ऐसा नहीं होगा।' 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

कोरोना की एक और लहर

लेकिन, अधिकतर एपिडेमियोलॉजिस्ट मानते हैं कि एक और पीक जरूर आएगा। साथ ही उत्तर भारत में स्मॉग से भरी सर्दियों में कोरोना संक्रमण के मामलों में बढ़ोतरी होगी। वे कहते हैं कि संक्रमण के मामलों और मौतों में आ रही गिरावट एक आशाजनक संकेत है, लेकिन यह कहना जल्दबाजी होगी कि महामारी खत्म हो रही है। यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन में बायोस्टैटिस्टिक्स और एपिडेमियोलॉजी की प्रोफेसर डॉक्टर भ्रमर मुखर्जी कहती हैं, 'ऐसा लगता है कि भारत में संक्रमण की पहली लहर चल रही है।' 

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