कोरोना ने देशभर के लोगों को परेशान करके रख दिया है। संक्रमण के मामले खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। इसमें उतार-चढ़ाव लगातार जारी है। कुछ जगहों पर तो संक्रमण के मामले बढ़ते ही जा रहे हैं, जबकि कुछ जगहों पर कम हो गए हैं। जिन क्षेत्रों में कोरोना के मामले कम हो गए हैं, वहां लोग समझ रहे हैं कि अब संक्रमण नहीं होगा, इसपर लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज के डॉ. राजेंद्र कुमार धमीजा कहते हैं, 'दूसरी लहर अभी भी जारी है, हम उससे अभी पार नहीं हुए हैं। वैक्सीन लगवाने के बाद भी हमें सभी कोरोना नियमों का पालन करना है। केस बेशक कम हुए हैं, लेकिन खत्म नहीं हुए हैं।' इधर पोस्ट कोविड ने भी लोगों को अलग परेशान करके रखा हुआ है। इसमें लोगों को तरह-तरह की समस्याएं हो रही हैं, जिसमें शुगर का बढ़ना भी शामिल है। आइए विशेषज्ञ से जानते हैं कि जिन लोगों को कोरोना के दौरान शुगर की बीमारी हुई, क्या वह बनी रहेगी या बाद में ठीक हो जाएगी और साथ ही कोरोना से जुड़े कुछ अन्य सवालों के जवाब भी...
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विशेषज्ञ से जानें: जिन लोगों को कोरोना के दौरान शुगर की बीमारी हुई, वो बाद में ठीक होगी या नहीं?
Sun, 29 Aug 2021 09:14 AM IST
सोनू शर्मा
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: सोनू शर्मा
Updated Sun, 29 Aug 2021 09:14 AM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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कोरोना पर विशेषज्ञ की राय
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जिन लोगों को कोविड के दौरान शुगर की बीमारी हुई, क्या यह बनी रहेगी या ठीक हो जाएगी?
- लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज के डॉ. राजेंद्र कुमार धमीजा कहते हैं, 'कोविड के ऊपर अभी भी कई शोध चल रहे हैं, हम अभी इवोल्विंग स्टेज में हैं। अभी तक इसका उत्तर नहीं मिला है कि लॉन्ग कोविड सिम्पटम कितने लॉन्ग हैं। अभी तक हमें जितना पता चला है, वह यही है कि तकरीबन 12 महीने यानी एक साल तक ये सिम्पटम (लक्षण) रह सकते हैं। जहां तक शुगर की बात है, जिन लोगों को बॉर्डर लाइन शुगर है, उन लोगों को कोविड हुआ है तो उनका शुगर, डायबिटिक रेंज में आ गया है। कुछ लोगों को स्टेरॉयड देने की वजह से भी शुगर बढ़ा है, यह बैक-टू-नॉर्मल हो सकता है या हो गया है। लेकिन जिन लोगों को कोविड की वजह से शुगर हुआ है, जो प्री-डायबिटीक थे, उनकी मॉनिटरिंग और रेग्युलर चेकअप होना बेहद जरूरी है।'
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कुछ लोग एंटीबॉडी टेस्ट करवाते हैं, आप क्या कहेंगे?
- डॉ. राजेंद्र कुमार धमीजा कहते हैं, 'वैक्सीन के बाद जो इम्यूनिटी आती है, वह एंटीबॉडीज के द्वारा भी आती है। एंटीबॉडी टेस्ट में बस हमारी न्यूट्रेलाइजिंग एंटीबॉडीज मेजर होती हैं। एंटीबॉडीज का होना बिल्कुल ये नहीं कहता है कि आपकी वैक्सीन कम रही या ज्यादा रही। वैक्सीनेशन केवल एक तरीका है, इसके अलावा भी कई तरीकों से एंटीबॉडी बनती है। केवल एंटीबॉडी टेस्ट पर न जाएं। बस खुद को सुरक्षित रखें, वैक्सीन लगवाएं और लगवाने के बाद भी कोविड नियमों का पालन जरूर करें।'
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क्या हम हर्ड इम्यूनिटी की तरफ बढ़ना शुरू हो चुके हैं?
- डॉ. राजेंद्र कुमार धमीजा कहते हैं, 'हर्ड इम्यूनिटी बहुत सारी चीजों पर निर्भर करती है। जैसे पहले कितने लोगों को इंफेक्शन (संक्रमण) हो चुका है और कितने लोगों को वैक्सीन लग चुकी है। तो हमें हर्ड इम्यूनिटी को सोचकर कभी भी लापरवाही नहीं करनी चाहिए। हम मास्क की बार-बार बात इसलिए करते हैं, क्योंकि मास्क न केवल हमें बचाता है बल्कि दूसरे लोगों को भी बचाता है, ताकि अगर एक व्यक्ति को संक्रमण है, तो वो दूसरे व्यक्ति को संक्रमित न कर पाए। हमारा यही प्रयास होना चाहिए कि हमारी वजह से कोई दूसरा संक्रमित न हो पाए।'
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अगर तीसरी वेव (लहर) आती है तो हमें क्या करना है?
- डॉ. राजेंद्र कुमार धमीजा कहते हैं, 'अगर हम बात करें कोविड की सेकंड वेव (लहर) की तो यह फरवरी में शुरू हुई थी। हमारी वैक्सीनेशन ड्राइव तेजी से आगे बढ़ रही है, लेकिन हमें अभी और ध्यान रखना है। हम अभी सेकंड वेव से बाहर नहीं निकले हैं। अगर हम वैक्सीनेशन ड्राइव को अच्छे से आगे बढ़ाएं, तो हो सकता है तीसरी लहर न आए। हम सबको एहतियात बरतना होगा, क्योंकि सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। हम भी सरकार का साथ दें और 'दो गज की दूरी, बहुत है जरूरी' पर अमल करें।'