कोविड-19 की महामारी ने ब्रिटेन के शाही घराने से लेकर भारत में ठेले पर सब्जी बेचने वाले तक को अपना शिकार बनाया है। जिस पर भी इसका दांव चला उसी को लपेटे में ले लिया। लोग कहते हैं कि कोरोना वायरस किसी की जाति, धर्म या लिंग देखकर थोड़ी वार करता है। लेकिन, अब तक के आंकड़े इस दावे को ग़लत ठहरा रहे हैं। नया कोरोना वायरस अपना शिकार बनाने में भेदभाव कर रहा है। कोविड-19 की महामारी मर्दों और औरतों पर अलग-अलग तरह से प्रभाव डाल रही है। इस वायरस का पुरुषों और महिलाओं की सेहत ही नहीं, बल्कि माली हालत पर भी अलग अलग असर दिख रहा है।
पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को ज्यादा प्रभावित कर रहा है कोरोना वायरस, आखिर कैसे?
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर फिलिप गोल्डर कहते हैं कि महिलाओं में रोग प्रतिरोधक क्षमता पुरुषों की तुलना में बेहतर होती है। किसी भी वायरस को सक्रिय होने के लिए खासतौर से कोरोना वायरस के लिए जिस प्रोटीन की आवश्यकता होती है वो 'एक्स क्रोमोसोम' में होता है। महिलाओं में 'एक्स क्रोमोसोम' दो होते हैं, जबकि पुरुषों में एक होता है। इसीलिए महिलाओं में किसी भी वायरस का प्रकोप झेलने की क्षमता ज्यादा होती है।
वायरस के पुरुषों को ज्यादा शिकार बनाने की एक वजह, जिंदगी जीने का सलीका हो सकती है। मतलब ये कि जो लोग गुटखा, तम्बाकू या सिगरेट का सेवन करते हैं उनमें किसी भी बीमारी के पनपने की संभावना ज्यादा होती है। सिगरेट पीने वालों के लिए तो किसी भी तरह के संक्रमण का शिकार होना बहुत ही आसान है। महिलाओं की तुलना में पुरुष सिगरेट ज्यादा पीते हैं। चीन में 50 फीसदी मर्द सिगरेट पीते हैं। जबकि ऐसा करने वाली महिलाएं केवल पांच प्रतिशत हैं। फिलहाल महामारी के दौर में इस दावे के पक्ष में कोई सबूत नहीं है। लिहाजा इस दावे पर अभी मुहर नहीं लगाई जा सकती।
लॉकडाउन की वजह से लगभग सभी तरह की आर्थिक गतिविधियों पर ब्रेक लग गया है। बड़े पैमाने पर लोगों के रोजगार छिन रहे हैं। पूरी दुनिया में मंदी का दौर शुरु होने वाला है। लेकिन मंदी का ये दौर अन्य दौर की मंदी से अलग होगा। क्योंकि, इस मंदी की मार सबसे ज्यादा महिलाओं पर पड़ने वाली है। अमेरिका में केवल मार्च महीने में करीब 10.40 लाख लोग बेरोजगार हुए हैं। 1975 के बाद अमेरिका में बेरोजगारी का ये सबसे बड़ा आंकड़ा है। इसमें पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की नौकरियां ज्यादा गई हैं।
इसकी एक वजह ये भी है कि मर्द ज्यादातर ऐसे पेशे से जुड़े होते हैं जो आर्थिक चक्र चलाने में मदद करते हैं। जैसे मैन्यूफैक्चरिंग या कंस्ट्रक्शन कंपनी। जबकि महिलाएं ज्यादातर ऐसे पेशों से जुड़ी होती हैं जो आर्थिक चक्र सही चलने पर ही काम कर सकती हैं। जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं, रेस्टोरेंट, बार आदि। लॉकडाउन के समय में फिलहाल ये सभी बंद हैं। लॉकडाउन के बाद भी जब ये सब सेवाएं बहाल होंगी तो जरुरी नहीं कि होटलों, बार और पब में शामें पहले की तरह गुलजार होंगी। पैसे की तंगी से सामना तो हर इंसान को होगा। इसका सीधा असर यहां काम करने वाली महिलाओं पर पड़ेगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ट्रैवल एंड टूरिज्म इंडस्ट्री में भी बड़े पैमाने पर महिलाएं ही काम करती हैं। अब जबकि यात्रा पर अनिश्चित काल के लिए पाबंदी है। तो, जाहिर है इस व्यवसाय से जुड़े सभी लोगों को इसका खामयाजा भुगतना होगा।
पुरुषों की तुलना में महिलाओं की आर्थिक स्थिति खराब होने की एक और वजह ये है कि पुरुषों के मुकाबले उन्हें वेतन कम मिलता है। 'द वर्ल्ड वी वॉन्ट' की सह-संस्थापक नताशा मुधर कहती हैं कि समान पद पर समान काम करने वाली महिला को दुनिया भर में पुरुष कर्मचारियों के मुकाबले कम पैसा दिया जाता है। अमेरिका में एक महिला को पुरुष की तुलना में 85 फीसदी ही सैलरी मिलती है। ऑस्ट्रेलिया में ये अनुपात 86 फीसदी और भारत में महिलाओं को पुरुषें की तनख्वाह का 75 फीसदी ही मिलता है। जहां रंग की बुनियाद पर भेद किया जाता है, उन देशों का तो और भी बुरा हाल है। मिसाल के लिए अमेरिका में श्वेत अमरीकी महिला की तुलना में अश्वेत अमरीकी महिला कर्मचारियों को 27 फीसदी कम वेतन दिया जाता है।
जो मर्द या औरत अकेले बच्चे की परवरिश कर रहे हैं, उनके लिए तो हालात और भी ज्यादा खराब होने वाले हैं। अमेरिका में ऐसे लोगों की संख्या दो करोड़ है। इसमें तीन चौथाई आबादी महिलाओं की है। ऐसे में अगर महिलाओं को किसी ऐसे सेक्टर में नौकरी मिल भी जाए जहां उन्हें गुजारे भर का पैसा मिल सकता है तो भी वो घर पर बच्चे की देखभाल के लिए किसी नर्स को रखने की स्थिति में नहीं होंगी। मतलब जबतक डे-केयर नहीं खुल जाते तब तक तो वो नौकरी कर ही नहीं पाएंगी।
लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में पॉलिटिकल साइंस की प्रोफेसर क्लेयर वेन्हम कहती हैं कि सभी महामारियों के दौरान पुरुषों और मर्दों के बीच का भेदभाव उजागर होता है। महिलाएं ही ज्यादा परेशानी झेलती हैं। लेकिन अफसोस की बात है कि नीति निर्माता कभी इस ओर ध्यान ही नहीं देते। प्रोफेसर क्लेयर वेन्हम और उनके साथियों ने जीका और इबोला महामारी के लिंग अनुसार प्रभाव पर रिसर्च की थी। और अब इसी तरह कोविड-19 के प्रभावों पर भी काम कर रही हैं। वो कहती हैं कि इबोला महामारी के दौरान मातृत्व मृत्यु दर में अचानक इजाफा हुआ था।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी कहा था कि महामारी के दौरान गर्भवती महिलाओं के लिए स्वास्थ्य सेवाएं जारी रहनी चाहिए। लेकिन, महिलाओं को गर्भनिरोधक चुनने तक का विकल्प नहीं मिल पाता। क्योंकि ये जरुरी सामान का हिस्सा नहीं समझे जाते हैं। परिवार नियोजन की संस्था मैरी स्टोप्स का कहना है कि कोविड-19 महामारी के चलते अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगभग 90 लाख 50 हजार महिलाएं और लड़कियां गर्भनिरोधक और गर्भपात की सेवा से वंचित रहेंगी।