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सिर पर बोझ और दिल में दर्द: उस रात कब-क्या और कैसे हुआ? कश्मीर से घर जा रहे लोगों ने बयां किया वो दर्दनाक मंजर

Tue, 19 Oct 2021 10:04 AM IST
प्रशांत कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू Published by: प्रशांत कुमार Updated Tue, 19 Oct 2021 10:04 AM IST
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target killing, Migrant workers returning from Kashmir to Uttar Pradesh, Bihar and Madhya Pradesh
कश्मीर से अपने घरों की ओर रवाना होते प्रवासी श्रमिक - फोटो : अमर उजाला

परिचितों की रविवार शाम को हुई हत्या के बाद हम कमरों में कैद हो गए। हम लोगों में से किसी ने भी रात में झपकी तक नहीं ली। ऐसा लगा कि आज की रात हमारे भाग्य का फैसला हो जाएगा। स्थानीय लोग बातचीत करने के लिए कमरे की तरफ आए लेकिन हमने दरवाजे तक नहीं खोले। पूरी रात बेहद खौफ में गुजरी। किसी भी समय बंदूकधारियों के कमरों में घुस आने की आशंका थी। रात ही में जानने वाले एक टैक्सी चालक को ज्यादा किराया देकर जम्मू पहुंचे। वनपोह से जम्मू तक के 12 घंटे के सफर में बच्चों से लेकर बड़ों तक किसी ने भी खाना तक नहीं खाया।



यह दर्द बिहार निवासी अरविंद पासवान, राहुल कुमार, अंजनी कुमार, अफजल अहमद का है। वह सात-आठ सालों से वनपोह इलाके में किराए पर रहते हैं। इन लोगों का कहना है कि अनुच्छेद-370 के हटने और विकास कार्यों के चलते आतंकियों में बौखलाहट है। इसी वजह से लोगों पर हमला कर रहे हैं। आगे की स्लाइड में जानिए उस रात कब-क्या और कैसे हुआ...

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कश्मीर से अपने घरों की ओर रवाना होते प्रवासी श्रमिक - फोटो : अमर उजाला

प्रवासी नागरिकों ने बताया कि रविवार सुबह आसपास के इलाके में सभी लोग काम करने के लिए निकले थे। ठंड बढ़ने पर शाम को जल्दी कमरे में पहुंच गए थे। शाम होते ही इलाके में अचानक फायरिंग की आवाज सुनाई दी। जिसे सभी ने अनसुना कर दिया। जैसे ही राजा रेशी, चुनचुन और जोगिंदर को आतंकियों के गोली मारने के बार में पता चला तो मुंह से शब्द नहीं निकला। तब से सभी एक दूसरे को मोबाइल पर यहां से निकलने को लेकर ही बात करने लगे। 


 
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कश्मीर से अपने घरों की ओर रवाना होते प्रवासी श्रमिक - फोटो : अमर उजाला

बिहार में इसकी सूचना के बाद लगातार घर वालों के फोन आने शुरू हो गए थे। घर वाले बेहद चिंतित हैं इसलिए हम घर ही जाना चाहते हैं। खौफ में हमने कमरे की लाइट तक नहीं जलाई। 


 
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कश्मीर से अपने घरों की ओर रवाना होते प्रवासी श्रमिक - फोटो : अमर उजाला

बिहार के भागलपुर जिले के पंकज यादव और राम विलास पासवान श्रीनगर में गोलगप्पे की रेहड़ी लगाते हैं। उन्होंने बताया कि वीरेंद्र पासवान की हत्या के बाद उन्होंने रेहड़ी लगानी बंद कर दी थी। दिन में करीब 400 से 500 की कमाई हो जाती है। उन्होंने बताया कि श्रीनगर में करीब बिहार के 100 से 150 लोग गोलगप्पे बेचने का काम करते हैं। कई रेहड़ी स्थानीय लोगों की है जिसे वह किराए पर लेते हैं। रामविलास ने बताया कि अनुच्छेद 370 हटने के दौरान भी इतनी चिंता नहीं हुई। कभी किसी हमले में उन्हें नुकसान नहीं पहुंचा था। अब डर सताने लगा है इसलिए सामान छोड़कर चले आए।


 
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कश्मीर से अपने घरों की ओर रवाना होते प्रवासी श्रमिक - फोटो : अमर उजाला

दूसरे प्रदेशों के मजदूरों की लगातार हत्याओं के बाद कश्मीर का माहौल फिर तनाव से घिर गया है। कुछ महीने से अचानक बढ़ी हिंसक घटनाओं पर सवाल उठने लगे कि क्या केंद्र शासित प्रदेश के हालात फिर से 90 के दशक जैसे हो रहे हैं। अल्पसंख्यकों की चयनित हत्या के बाद घाटी से बड़े पैमाने पर पलायन शुरू हो गया है। बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश के कामगार घरों को लौटने लगे हैं।

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